गुरुवार, 4 जनवरी 2024

अधूरी कहानी- केदार शर्मा 'निरीह '


 केदार शर्मा 'निरीह '

अधूरी कहानी

 

    पूजा करने हेतु लोटा भरने के लिए दीनानाथ उस मौहल्ले के एकमात्र हेण्‍डपम्प पर रोज की भाँति गए। वहाँ पहले से ही अपना कलश भर रही किरण को देखकर वे चौंक  गए—“ अरे किरण ! तुम यहाँ कैसे ? 

     सर, प्रणाम। मैं भी आपके इसी मौहल्ले में  रहने लगी  हूँ। मेडम जी भी मुझे जानती हैं। मैं एक  बार आपके घर भी जा चुकी हूँ, पर उस दिन आप नहीं मिले थे।“

        सर, आपकी लिखी कहानी,जो पिछले रविवार को अखबार में छपी थी , बहुत अच्छी लगी ,पर यह कहानी जाने क्यों अधूरी सी लगी ।इस कहानी की मुख्‍य पात्र सूर्या अपने शराबी पति को छोड़कर अपने पिता के घर पर रहने लगती है । वह आत्मनिर्भर बनकर पिता की सेवा  भी करने लगती है ।पर सर, फिर आगे सूर्या  का क्या हुआ होगा ? सर, इस कहानी को और आगे लिखिए ना ।“ वह बिना रूके बोले जा रही थी ।

           दीनानाथ ने  कहा — किरण , ‘मुझे यह जानकर खुशी हुई कि इतने ध्‍यान से तुमने कहानी पढ़ी है । तुम तो जानती ही  हो कि कहानियों में कल्पना का समावेश होता है । यह भी एक काल्पनिक कहानी थी और सहज रूप से जो अंत होना था वह हो गया ।“

            ‘’ नहीं सर, आप तो लेखक हैं जहाँ कहानी समाप्त हुई है उसके आगे की भी कल्पना कर सकते हैं कि आखिर सूर्या का आगे क्या हुआ होगा? सर, मेरे लिए प्लीज, वह लगभग गिड़गिड़ाने सी लगी थी । उस दिन तो दीनानाथ उसे बिना कोई आश्‍वासन दिए घर चले आ गए 

            पूजा के समय भी किरण की वही अनुनय भरी आवाज उनके भीतर गूँजती रही । हर पाठक को संतुष्‍ट नहीं किया जा सकता यह सोचकर उन्होंने अपने आप को सहज कर लिया । पर जब भी किरण मिलती वही प्रश्‍न दोहराती—"सर , कहानी पूरी हुई या नहीं ?” हर बार प्रयास करने की बात कहकर वे  हँसकर टालते रहे ,  पर तीव्र तूफान में उद्वेलित हुई सागर की लहरों की भाँति  अब उनके मन में ऊहापोह चलने लगा था ।

        एक दिन अपनी पत्नी  यशोदा के साथ दीनानाथ चाय पीने बैठे तो उन्होंने पूछ लिया-‘’तुम किसी किरण नाम की लड़की को जानती हो ?

   हाँ जानती हूँ, बेचारी मुसीबत की मारी है । ऐसे दिन भगवान किसी को न दिखाए”-नि:श्‍वास निकालते हुए उसने कहा। एक दिन यहाँ आई भी थी । आपके बारे में पूछ  रही थी । सारे समय ‘’ हमारे  सर , हमारे  सर........  ‘’ कहकर पूरे समय  आपकी प्रशंसा  किए जा रही थी।  

       ‘’बताओ क्या हुआ उसके साथ?’’ उनकी जिज्ञासा अब किसी उत्तुगं शिखर पर थी । 

                हुआ यह कि उसके माता-पिता अच्छे भले गाँव से इस मुए शहर में बसकर एक मंदिर की पूजा का काम संभाले हुए थे।कोरोना की पहली लहर में किरण की मां संक्रमित हो गई, जो पहले से ही मधुमेह रोग से पीडि़त थी ,और एक दिन चल बसी । बेचारा पिता अकेला रह गया। एक ही संतान थी यह किरण,   जिसका विवाह पास ही के एक गाँव में हुआ था । पति किसी प्राइवट कंपनी में कलर्क था पर शराबी था ।वह आए दिन किरण के साथ मारपीट करता था। किरण उसे छोड़कर कई-कई दिन तक अपने पिता के पास रहती ।पर पिता हर बार उसे समझा-बुझाकर निभा लेने की सलाह देता और वापस ससुराल भेज देता ।

             पर एक दिन तो हद हो गई । वह अँधेरी काली रात थी । बाहर तूफान और बरसात का कहर था । चारो तरफ पेड़़ों के झूमने बिजली के रह-रहकर कड़कने और मूसलाधार बरसात की आवाज वातावरण को डरावना बनाए हुए थी। उधर भीतर उसका पति नशे में धुत होकर बलात् बार-बार उसे  पीट रहा था और वह बार-बार चंगुल से छूटने के लिए संघर्ष कर रही थी । उसकी गोद में चार साल की बच्ची पूरी शक्ति के साथ चीख रही थी ।

                  आखिरकार किरण कमरे से बाहर निकलने और बाहर की चिटकनी लगाने में कामयाब हो गयी । सवेरा होते ही हमेशा के लिए अपने पिता के पास आ गई और किसी निजी स्कूल में कम्प्यूटर का काम कर गुजारा करने लगी । अभी कोरोना की दूसरी लहर में पिता भी पॉजीटिव आ गए । वह घर पर ही उपचार और सेवा करने लगी। एक दिन श्‍वास लेने में तकलीफ होने के कारण किरण ने उनको अस्पताल में भती कराया । सात दिन तक वेंटीलेटर पर रहने  के बाद भगवान को प्यारे हो गए । अब किरण अपनी बच्ची के साथ अकेली ही रह रही है।

       दीनानाथ अतीत  के  किसी गहरे आयाम में खो गए। जिस  गाँव में किरण का परिवार रहता था उसी गाँव में दीनानाथ सोलह साल तक अध्‍यापक रहे थे ।

       उन्हें याद आ रहा था कि किस तरह किरण पहली कक्षा में भर्ती हुई थी और सीनीयर सैकेण्‍डरी पास करके निकली थी । सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेल सहित ऐसी कोई गतिविधि नहीं थी जिसमें वह बढ़-चढ़कर भाग नहीं लेती हो । बहुत ही कुशाग्र बुद्धि,विनम्र और होनहार लड़की थी ।मुस्कराहट सदा उसके चेहरे पर तैरती रहती  थी ।कभी-कभी तो उनको लगता जैसे कोई दैवीय आभा किरण के भीतर बसी हो और उसकी सदाबहार मुस्कराहट के माध्‍यम से झलक पड़ती हो ।

             अब उनके समझ में आया कि आखिर किरण बार-बार  क्यों कह रही थी कि कहानी की सूर्या  का आगे क्या हुआ? किरण के भविष्‍य का प्रश्‍न उनके मन मष्तिष्‍क को  भी व्यथित करने लगा—‘क्या होगा बेचारी का?’

            एक दिन दोपहर के खाली समय में बातों दौर चल रहा था। यशोदा कोरोना काल को सेवा का अवसर बता रही थी। वह बता रही थी कि किस तरह उनका बेटा अखिलेश, जो फिजियोथेरेपिस्ट था, जरूरतमंदो के पास जाकर दस्ताने पहनकर अपने हाथों से मरीजों के शरीर की मसाज कर रहा था ,थेरेपी की प्रक्रिया समझा रहा था और थेरेपी से संबधित वीडि़यो डाल रहा था ।

            समय का अनुकूल रूख भाँपकर उन्हानें प्रस्ताव रखा — “अगर आप सब सहमत हो जाएँ तो एक और पुण्‍य-कार्य किया जा सकता है । “ सभी दीनानाथजी की ओर जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखने लगे । वे थोड़ा रूके मानो कहने का साहस इकट्ठा कर रहे हों। आखिरकार उन्होनें कह ही दिया—“ क्यों नहीं हम किरण को अपने घर की बहू बना लें।“ वह पढ़ी—लिखी,सुंदर और समझदार लड़की है ।

       सुनते ही सब ओेर सन्नाटा छा गया। मानो सभी को साँप सूँघ गया हो । थोड़ी देर बाद यशोदा ने ही चुप्पी तोड़ी—“आपकी मति तो नहीं मारी गयी है? हमारे एक ही बच्चा है और आपने यह सब कैसे सोच लिया? क्या हम उसका विवाह ऐसी तलाकशुदा लड़की से कर दें जिसके साथ  एक बच्ची भी हो? समाज के लोग क्या कहेंगे ?

                      दीनानाथ ने उस समय कुछ भी कहना उचित नहीं समझा। वे चुपचाप अपने काम में लग गए ।

           शाम  तक सभी  गंभीर और गुमसुम रहे । एक अजीब तरह का मौन चारों तरफ पसर गया था ।

               रात को खाने के समय सब फिर एक साथ बैठे। बात दीनानाथ ने ही शुरू की —“देखो किसी को भी परेशान होने की जरूरत नहीं है। विवाह अखिलेश और तुम्हारी सहमति से ही होगा। मैं तो इसलिए कह रहा था कि बारह साल तक मैने किरण को करीब से देखा है । माता-पिता के बाद एक अध्‍यापक ही होता है जो विद्यार्थी को गहराई से जानता है । किरण एक विनम्र,कुशाग्र बुद्धि और संवेदनशील लड़की है और संघर्षो ने उसे तपाकर औार निखार दिया है ।वह अकेली अपनी किश्‍ती में सवार होकर इस संसार सागर की लहरों से जूझ रही   है । उसके आने से न केवल अखिलेश के जीवन में बल्कि हमारे परिवार की बगिया में भी एक नई बहार आ सकती है । फिर जैसी  आप लोगों की मर्जी । “

         दीनानाथ ने  सुबह उठकर देखा तो पाया कि दोनो मां—बेटे गहन विचार-विमर्श में मग्न थे । आखिरकार दोनों की सहमति मिल गई । एक सादे पारिवारिक स्तर के कार्यक्रम में वरमाला का आदान-प्रदान हुआ  । किरण के एकमात्र रिश्‍तेदार मामा-मामी ने माता-पिता की भूमिका अदा की और किरण दीनानाथ के घर की बहू बनकर आ गई ।

           दीनानाथ ने भी आशीर्वाद समारोह और छोटा सा प्रीतिभोज का कार्यक्रम रखा। वर—वधू सभी बड़ों का चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद ले रहे थे । दोनों ने  दीनानाथ के पैरो में झुककर प्रणाम  किया —“जुग जुग जियो, तुम्हारी जोड़ी चिरजींवी और सुखी रहे।“ फिर किरण की ओर देखकर बोले— “अब तो मेरी अधूरी कहानी पूरी हो गयी होगी,बेटा ।“ 

          किरण भावुक हो गयी । उसकी आँखों से कुछ आँसू टपककर मानो  दीनानाथ के चरणों का अभिसिंचन करने लगे। किरण एक बार फिर दीनानाथ के पैरों में झुकी—“आप महान हो,सर ! “     “सर  ही नहीं...” ।

      ओह सोरी, ’पापा’ भी । अपने आसूँ पौंछते हुए किरण मुड़ गयी ।

                         केदार शर्मा,”निरीह 

कहानियां, व्यंग्य, कविताएं,गीत विधाओं में रचनाएं राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर,अमर उजाला, दैनिक नवज्योति, दैनिक जनवाणी,शिविरा पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं।


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