रविवार, 26 अप्रैल 2026

‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज-कवि: विवेक कुमार मिश्र,समीक्षक व सौन्दर्यविद डॉ. रमेश चन्द मीणा सहायक आचार्य- चित्रकला राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा


 ‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज


पुस्तक शीर्षक: इस तरह आदमी

कवि: विवेक कुमार मिश्र

विधा: कविता संग्रह

प्रकाशन: वेरा प्रकाशन, जयपुर

पृष्ठ: 163

मूल्य: 250₹


समकालीन हिंदी कविता में ऐसे काव्य-संग्रह कम ही मिलते हैं जो पाठक को केवल शब्दों का रसास्वादन कराने तक सीमित न रखकर उसे आत्मबोध की यात्रा पर भी ले जाएँ। विवेक कुमार मिश्र का नवीन कविता-संग्रह “इस तरह आदमी” इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय कृति है। वेरा प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित यह संग्रह अपने शीर्षक से ही संकेत देता है कि यहाँ ‘आदमी’ केवल एक सामाजिक प्राणी नहीं, बल्कि अनुभवों, संवेदनाओं और अस्तित्वगत प्रश्नों का केंद्र है।

इस संग्रह में संकलित 80 कविताएँ एक सुसंगठित भाव-यात्रा का निर्माण करती हैं। इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे किसी बाहरी घटनाक्रम से अधिक भीतर की हलचलों को स्वर देती हैं। कवि ‘आदमी’ से आरंभ करता है, उसे संसार के विविध आयामों से जोड़ता है और अंततः उसी आदमी के भीतर लौट आता है। यह आवर्तन ही इस संग्रह का दार्शनिक आधार है—मानो जीवन का समस्त विस्तार अंततः मनुष्य के भीतर ही सिमट आता हो।

कवि की भाषा इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति है। यह भाषा न तो जटिल बौद्धिकता का बोझ उठाती है और न ही कृत्रिम अलंकरणों का सहारा लेती है। सहज, सरल और आत्मीय शैली में लिखी गई ये कविताएँ पाठक के मन में बिना किसी बाधा के प्रवेश करती हैं। ऐसा लगता है जैसे कवि कोई गूढ़ सत्य नहीं सुना रहा, बल्कि हमारे भीतर पहले से मौजूद अनुभूतियों को शब्द दे रहा है। इसीलिए संग्रह की कविताएँ ‘आत्मलिपि’ की तरह प्रतीत होती हैं—जिनमें कवि का जीवन ही नहीं, पाठक का अपना जीवन भी प्रतिबिंबित होता है।

विषय-वस्तु की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत व्यापक है। इसमें मनुष्य के अस्तित्व, उसके संघर्ष, प्रेम, पीड़ा, अकेलेपन, आशा और विश्वास जैसे अनेक आयामों को स्पर्श किया गया है। ‘खुशी का पत्थर’, ‘धूसर रंग’, ‘आदमी को आदमी रहने दें’, ‘यात्रा एक खोज है’, ‘विश्वास ही आखिरी रास्ता है’ जैसी कविताएँ जीवन के सामान्य अनुभवों को असामान्य संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं। इन कविताओं में कहीं भी उपदेशात्मकता नहीं है; बल्कि वे अनुभवों के माध्यम से पाठक को स्वयं सोचने और समझने के लिए प्रेरित करती हैं।

कवि का प्रकृति-बोध भी उल्लेखनीय है। प्रकृति यहाँ केवल सजावटी तत्व नहीं, बल्कि मनुष्य के आंतरिक संसार का विस्तार है। पेड़, पक्षी, हवा, रंग—ये सभी प्रतीक बनकर मनुष्य के भाव-जगत को अभिव्यक्त करते हैं। ‘पेड़ खिलखिला रहा था’ या ‘परिंदे आ ही जाते हैं’ जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि कवि प्रकृति को जीवंत संवेदना के रूप में देखता है। प्रकृति और मनुष्य के बीच यह आत्मीय संबंध कविताओं को और अधिक गहराई प्रदान करता है।

इस संग्रह का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका दार्शनिक स्वर है। कवि जीवन के जटिल प्रश्नों को सरल भाषा में व्यक्त करता है। वह अस्तित्व, सत्य, और आत्मसाक्षात्कार जैसे विषयों पर विचार करता है, किंतु कहीं भी दुरूहता नहीं आने देता। ‘कहीं कोई मुक्त होता’, ‘यथार्थ काफी नहीं है’, ‘अस्तित्व की कथा’ जैसी कविताएँ इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं में कवि जीवन की अनिश्चितताओं को स्वीकार करता है और इसी स्वीकार में एक प्रकार की मुक्ति का बोध कराता है।

काव्य-संग्रह का एक और सशक्त पक्ष इसका बिंब-विधान है। कवि ने अत्यंत साधारण प्रतीकों और चित्रों के माध्यम से गहन अर्थों की सृष्टि की है। ‘कागज कोरे नहीं होते’ जैसे शीर्षक ही अपने आप में एक गहरी संवेदना को प्रकट करते हैं। इन बिंबों की विशेषता यह है कि वे पाठक के अनुभव से जुड़े होते हैं, इसलिए वे सहज ही उसके मन में उतर जाते हैं। यह बिंब-विधान कविताओं को स्मरणीय बनाता है।

मानवीय संवेदनाओं की प्रस्तुति में कवि की दृष्टि अत्यंत उदार और मानवीय है। वह आदमी को उसकी समग्रता में देखने का आग्रह करता है—उसकी कमजोरियों, संघर्षों और संभावनाओं सहित। ‘आदमी को आदमी रहने दें’ जैसी कविताएँ आज के समय में विशेष प्रासंगिक हैं, जब मनुष्य अपने मूल मानवीय गुणों से दूर होता जा रहा है। कवि यहाँ किसी आदर्श की स्थापना नहीं करता, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करने की बात करता है।

संग्रह की रचनाओं में एक निरंतर प्रवाह है, जो पाठक को अंत तक बाँधे रखता है। प्रत्येक कविता अपने आप में पूर्ण होते हुए भी समग्र रूप से एक बड़े कथ्य का हिस्सा बन जाती है। यह कथ्य है—मनुष्य और उसके अस्तित्व की खोज। इस दृष्टि से यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है।

यदि कुछ सीमाओं की बात करें तो कहीं-कहीं कविताओं की समान भावभूमि पाठक को एकरूपता का आभास करा सकती है। कुछ रचनाएँ अपने कथ्य को और अधिक विस्तार दे सकती थीं। फिर भी, यह कमी समग्र प्रभाव को कम नहीं करती, क्योंकि कवि की संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति की ईमानदारी पाठक को निरंतर जोड़े रखती है।

अंततः कहा जा सकता है कि “इस तरह आदमी” एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जो अपने सरल रूप में गहन जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह पाठक को बाहरी दुनिया से अधिक अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है। विवेक कुमार मिश्र ने इस संग्रह के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि सच्ची कविता वही है जो मनुष्य को उसके अपने अस्तित्व से जोड़ सके।

यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो कविता में केवल शब्दों की सजावट नहीं, बल्कि जीवन का सार तलाशते हैं। इसे पढ़ते हुए पाठक स्वयं से संवाद करने लगता है और यही इस संग्रह की पहचान है।


समीक्षक व सौन्दर्यविद

डॉ. रमेश चन्द मीणा

सहायक आचार्य- चित्रकला

राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा

9816083135

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

सरदार वल्लभभाई पटेल: संस्कृति और स्वराज्य -डॉ0 रवीन्द्र कुमार* एवं सुश्री कमलेश कुमारी**




सरदार वल्लभभाई पटेल: संस्कृति और स्वराज्य डॉ0 रवीन्द्र कुमार* एवं सुश्री कमलेश कुमारी** अँग्रेजी साम्राज्यवाद से स्वाधीनता के द्वार पर पहुँच रहे भारत के भविष्य के सम्बन्ध में स्वत्वों के अपने समय के सबसे बड़े पोषक और संरक्षक सरदार वल्लभभाई पटेल ने देशवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा था, “हम ऐसा स्वराज्य चाहते हैं, जिसमें सैंकड़ों लोग रोटी के अभाव में न मरें। किसानों द्वारा उत्पन्न किया गया अन्न उनसे छीनकर विदेश न भेजा जाए। जनता वस्त्रों के लिए अन्यों पर निर्भर न हो। स्वराज्य में लोगों के सम्मान की रक्षा स्वेच्छा से हो। स्वदेशी, जनता का स्वाभाविक धर्म हो। कार्य की भाषा स्वदेशी हो। शिक्षा का माध्यम स्वदेशी भाषा हो। भेदभाव के बिना समान रूप से जन स्वतंत्रता की रक्षा हो। संस्कृति और जीवन-मूल्य सदैव ही उच्च स्थान पर रहें। जन उपभोग की वस्तुओं के मूल्य नियंत्रित हों। स्वराज्य में प्रत्येक नागरिक को न्याय सुलभ हो; न्याय खर्चीला न हो। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन में आकाश-पाताल का अन्तर न हो। स्वयं देशवासियों की कर्त्तव्यनिष्ठा द्वारा ही राष्ट्र हर ओर से आत्मनिर्भर, सुरक्षित और सुदृढ़ हो एवं देश का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हो।“ सरदार पटेल के सम्बोधन में, निस्सन्देह, स्वाधीन हिन्दुस्तान के भविष्य का चित्र था। ऐसा चित्र, जिसमें समस्त देशवासियों की आत्मनिर्भरता की कामना थी; स्वदेशीकरण था तथा हर रूप में राष्ट्रीय मूल्यों एवं संस्कृति का आदर था। अपने पास उपलब्ध संसाधनों तथा देशवासियों के परिश्रम से राष्ट्र-निर्माण था। इसमें सभी, आम और खास, के लिए समानता, स्वतंत्रता, न्याय और अधिकारों की सुनिश्चितता थी। इससे भी आगे बढ़कर, भारतवासियों के लिए विश्व-धरातल पर सम्मानजनक स्थिति को प्राप्त करना था। इस प्रकार, संक्षेप में, हर रूप में आत्मनिर्भर, विकसित और सबल भारत का निर्माण करना था। सबल-सक्षम भारत, जिसका स्वयं भारतवासी अपने पुरुषार्थ से निर्माण करें, स्वयं हिन्दुस्तानी जिस पर गर्व करें और सारा विश्व जिसका सम्मान करे। सक्षम और सबल भारत अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना योग्य स्थान बनाए, विश्व-व्यवस्था में अपनी अग्रणीय भूमिका का निर्वहन करे और विश्व-कल्याणार्थ योगदान दे। सरदार वल्लभभाई पटेल की कल्पना का भारत ऐसा था। ऐसे भारत के निर्माण के लिए, निस्सन्देह, प्रत्येक देशवासी की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति आवश्यक थी, और आज भी है। प्रत्येक हिन्दुस्तानी को स्वयं की उन्नति के लिए समान अवसरों की प्राप्ति होना आवश्यक थी, और आज भी है। मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना और समान अवसरों की प्राप्ति के अभाव में कोई भी वंचित नागरिक देश की समृद्धि, प्रतिष्ठा और एकता-निर्माण के लिए योगदान नहीं कर सकता। देश के गौरव, आत्मनिर्भरता और अखण्डता की अक्षुण्णता के लिए अपरिहार्य भूमिका का, चाहकर भी, निर्वहन करने में सक्षम नहीं हो सकता। भारत एक कृषि प्रधान देश है। ग्रामों का देश है। कृषि ही आजतक भी देश की अर्थव्यवस्था की धुरी है। तो भी, हजारों किसान प्रतिवर्ष आत्महत्याएँ करते हैं। आत्महत्याओं के पीछे जो कारण हैं, उनमें प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली अपूरणीय क्षति, परिणामस्वरूप फसलों की विफलता और वैकल्पिक साधनों की अनुपलब्धता है। किसानों पर ऋण का दबाव और परिणामस्वरूप उन पर भारी मानसिक तनाव का होना है। ऐसी स्थिति में वे बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं; वे मृत्यु को गले लगते हैं। यही नहीं, किसानों को, अब देश की स्वाधीनता के अठहत्तर वर्षों के बाद भी, फसलों के उचित दाम न मिलना, उनका घाटे में रहना और कुल मिलाकर, कृषि कार्य का उनके लिए वरदान नहीं, अपितु कई बार अभिशाप बन जाता है। वर्ष 2001-2014 तक के सरकारी आंकड़ों को देखें, तो ज्ञात होगा कि इस अवधि में दो लाख से भी अधिक किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं। यह, वास्तव में ही, भारतीय संस्कृति, सामाजिक ताने-बाने और अर्थव्यवस्था के मेरुदण्ड उन किसानों के सम्बन्ध में दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जाजनक है, जो सरदार पटेल के लिए देश की आत्मा थे। आजतक भी हैं। किसानों के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल कहा करते थे, "जब-जब भी किसानों पर दुख पड़ता है, तब-तब मेरी आत्मा द्रवित हो जाती है। मैं किसानों के दुखों को दूर कर सकूँ, उन्हें आत्मनिर्भर बना सकूँ, तो इससे बड़ा मेरा और कौन-सा सौभाग्य होगा।" सरकारी-असरकारी दावे कुछ भी हों, लेकिन सत्यता यह है कि भारत में अभी भी लगभग पैंतीस करोड़ लोग, अधिकांशतः ग्रामीणजन और किसान, गरीबी रेखा के नीचे हैं। ऐसे में उनकी स्थिति क्या है, इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। तो भी, यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि ऐसे लोगों का जीवन अभावग्रस्त है। ऐसे लोगों की प्रतिदिन आय एक सौ रुपये से कम है। इतनी कम आय में उनके जीवन का स्तर क्या होगा, इसका भली-भाँति अनुमान लगाया जा सकता है। देश में करोड़ों जन अन्य समस्याओं से ग्रस्त हैं। स्वास्थ्य-चिकित्सा, शिक्षा, आवास के साथ ही न्याय-सुलभता उनके सामने चुनौतियों के रूप में हैं। यह स्थिति स्पष्टतः स्वाधीनता के अमृतकाल में भी हमारे सामने है। यह स्थिति सरदार वल्लभभाई पटेल की कल्पना के स्वराज्य के सम्बन्ध में, जो स्वयं एक बेजोड़ किसान नेता थे, ग्रामीण भारत का स्वर थे और संगठित भारत के निर्माता भी, हम सभी से आत्मचिन्तन की अपेक्षा रखती है। तदनुसार हमसे कार्य की अपेक्षा करती है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वाधीनता संग्राम में अग्रिम पंक्ति में रहकर कार्य किया। उन्होंने बारडोली किसान संघर्ष (वर्ष 1928 ईसवीं) सहित अनेक सत्याग्रहों को स्वयं नेतृत्व प्रदान किया। संघर्षों में सफलताएँ प्राप्त की थीं। स्वराज्य-प्राप्ति के लिए महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुई सभी कार्यवाहियों में भी उन्होंने अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। लाखों-करोड़ों ग्रामीणों-किसानों व श्रमिकों के लिए वे प्रेरणास्रोत बनें थे। वे उनकी आशाओं का केन्द्र रहे थे। सरदार पटेल स्वयं उनकी आत्मनिर्भरता, सामाजिक-समानता और समृद्धि को स्वराज्य की परीक्षा की कसौटी मानते थे, जो आजतक भी न केवल प्रासंगिक है, अपितु इसमें ही स्वतंत्रता और स्वराज्य, दोनों, की उपलब्धियों की परख भी है। सरदार साहेब बहुत ही दूरदर्शिता थे; वे इस सत्य से पूर्णतः अनुभूत थे कि किसी देश के सांस्कृतिक मूल्य एवं परम्पराएँ रक्त-शिराओं की भाँति उसके हृदय से जुड़ी होती हैं। निज संस्कृति के अभाव में, देश अथवा देशवासी धीरे-धीरे अपने मूलता से विरत हो जाते हैं, और शक्तिहीन हो जाते हैं। भारत के सम्बन्ध में तो यह वास्तविकता हम सबके संज्ञान में हैं ही। हिन्दुस्तान में विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराएँ, धागों की भाँति, राष्ट्रीय संस्कृति की विभिन्नता में एकता का ताना-बाना बुनती हैं। सरदार पटेल देश की स्वतंत्रता के मार्ग पर अनेक क्षेत्रीय भाषाओं, रीतियों, प्रथाओं और धार्मिक आस्थाओं को एक आत्मीय सूत्र में पिरोकर आगे बढ़े। उसी के बल पर साढ़े पाँच सौ से भी अधिक देशी राज्यों का संघीय ढाँचे में विलय कराकर उन्होंने अखण्ड भारत का निर्माण किया। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ब्रिटिश दासता से मुक्ति के उपरान्त देश पुनर्निर्माण की ओर आगे बढ़ा, और आज भी बढ़ रहा है। लेकिन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में विशेष रूप से उक्त-वर्णित स्थिति को केन्द्र में रखते हुए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। साथ ही, देश के सांस्कृतिक मूल्यों को केन्द्र में रखते हुए, राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिबद्धता और वृहद् राष्ट्रीय सोच की नितान्त आवश्यकता है। विशेष रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल के सांस्कृतिक विचारों को ही केन्द्र में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। सरदार पटेल ने कहा था कि इस देश की संस्कृति हमें एकता के सूत्र में पिरोती है और सभी देशवासियों का, साथ-साथ आगे बढ़ते हुए, राष्ट्रीय अखण्डता, सुदृढ़ता व सम्पन्नता का आह्वान भी करती है। सरदार साहेब ने यह भी कहा था कि सामाजिक व राष्ट्रीय एकता, किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना देश के आमजन की समानता और आत्मनिर्भरता द्वारा ही सच्चे अर्थों में स्थापित हो सकती है, और राष्ट्रीय एकता ही भारत की सुदृढ़ता, समृद्धि एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके योग्य स्थान को सुनिश्चित कर सकती है। इसलिए, समावेशी, सहयोग, सामंजस्य एवं वृहद् स्तर पर सौहार्द-स्थापितकर्त्री संस्कृति को केन्द्र में रखकर भारतीय स्वराज्य के सम्बन्ध में सरदार वल्लभभाई पटेल के विचार आज, स्वयं उनके समय से भी अधिक प्रासंगिक हैं। अखण्ड भारत के निर्माता भारतरत्न सरदार पटेल की 150वीं जन्मजयन्ती और 75वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उनके आह्वान का अंगीकरण, तदनुसार कार्य ही उन्हें सच्चे अर्थों में स्मरण करने एवं श्रद्धान्जलि देने का श्रेष्ठ मार्ग है। *पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भारतीय शिक्षाविद प्रोफेसर डॉ0 रवीन्द्र कुमार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के पूर्व कुलपति हैं; वर्तमान में स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ के लोकपाल एवं स्वामी विवेकानन्द शोध पीठ के अध्यक्ष व प्रोफेसर हैं। डॉ0 कुमार ‘बिजनेस इकोनॉमिक्स’, कोलकाता के सलाहकार भी हैं। **सुश्री कमलेश कुमारी रचनात्मक लेखिका, कवयित्री और वर्तमान में हरियाणा राज्य शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं।

‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज-कवि: विवेक कुमार मिश्र,समीक्षक व सौन्दर्यविद डॉ. रमेश चन्द मीणा सहायक आचार्य- चित्रकला राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा

 ‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज पुस्तक शीर्षक: इस तरह आदमी कवि: विवेक कुमार मिश्र विधा: कविता संग्रह प्रकाशन: वेरा प्रकाशन, जयप...