गुरुवार, 25 जनवरी 2024

जिनकी धरती नहीं है - अमर


 

जिनकी धरती नहीं है

 मैंने इज्जतदार आदमी की तरह जीने के लिए

तमाम जुगत -जुगाड़ बैठाए

मैंने कोशिश की

किसी से कर्जा भी इज्जतदार आदमी की तरह लूँ

मैं चोरी और बेइमानी भी करता

शरीफ़ आदमी की तरह करता

 ऐसे तो मेरी सारी हकीकत मालूम हैं मुझे

मेरे बीबी - बच्चें भी जानने लगे हैं

मेरी विवशता

और यह सारा गाँव भी जानता है

 

रात के अंधेरों में पत्नी बड़बड़ाती है

गहने बेच दिए, जमीन बेच दी

रहने की जगह को गिरवी रख दिया है तूने

 कहने को तो लोग यह भी कहते हैं

इसने बेटियों का मोल किया हैं

खुद की उम्र के किसी दूजवर आदमी से

एक को किसी बस कंडक्टर साथ भेज दिया

दूसरी को चंबल की तरफ बेच आया है

 इस दुनिया में रहते हुए

कोई किसी का भी हो सकता है

खेत, घर और आदमियों के बारे में क्या कहें

तुम्हारा देस भी किसी दूसरे का हो सकता है

लेकिन किसी सताये हुए आदमी का जीवन

दूसरे का नहीं होता

  अब मेरे नहीं तो तुम्हारे खेतों को देखकर खुश हूँ

मेरी नहीं तो तुम्हारी बेटियों को देखकर खुश हूँ

और मै खुश हूँ पहाड़ के नीचे सरकारी जमीन पर रहकर

जो कम से कम इस गाँव की तो नहीं है

 इस उजाड़ पहाड़ के नीचे रहते हुए

बस एक चिंता सताए जाती है रात - दिन

जिनका कोई हिस्सा नहीं बचा है इस धरती पर

उन्हें उजाड़ने के लिए

पहले सरकार आयेगी या मृत्यु !

विजयदान देथा की कहानियाँ- डॉ.मनु शर्मा


 

विजयदान देथा की कहानियाँ

 

विजयदान देथा 'बिज्जी' ने खुद अपने बारे में काफी विस्तार से लिखा है। दूसरे लोगों ने उन पर अपेक्षाकृत कम लिखा है। इसकी वजह शुरू में उनके लेखन की भाषागत सीमायें हो सकती है। आगे चलकर उनके रचनाकर्म के जब पर्याप्त अनुवाद उपलब्ध हुए तो उनकी लोकधर्मी किस्सागोई और भाषायी सम्मोहन से लोग चकित हो उठे। उनकी कहानियाँ कौतूहल प्रधान लोककथाओं के ताने-बाने से बुनी हुई और दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का विलक्षण हल देने वाली है। उत्सुकता और अनुरंजन जैसे कहानी के मूल तत्त्वों की रक्षा करते हुए उन्होंने कथानक प्रधान राजस्थानी लोककथाओं का घटना प्रधान पुनसृजन करके अपनी रचनात्मक मौलिकता सिद्ध की है।

अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में लिखते हुए बिज्जी कहते है-"मैंने राजस्थानी की कदीमी 'वातों' जिन्हें हिन्दी में लोककथायें कहते हैं, को जस का तस लिपिबद्ध नहीं किया है। कथाओं के अभिप्राय को जैसा बीज हाथ लगा, उसे उसी तरह विकसित किया। मोध्ये के बीज को मोथ्ये जैसा। आक के बीज को आक के अनुसार। बेर और खेजड़ी के बीज को उनके मुताबिक। बरगद-पीपल के बीजों को उनके माफिक, उन्हें वैसा ही फैलाव दिया। "(समकालीन भारतीय साहित्य, अंक-65, पृ. 13)। कहना न होगा कि कहानियों का कथ्य (थीम) तो उन्होंने लोक कथाओं से लिया लेकिन उसे बरता अपने ढंग से। उसे रंग-रूप और स्वभाव ठीक आज के जीवन सन्दर्भों के अनुसार दिया। युगीन यथार्थ से जोड़कर बिज्जी ने उन लोक कथाओं को मार्मिक और बहुआयामी कहानियों के रूप में ढ़ाल दिया है। उनकी इसी खूबी के चलते लोक की वाचिक परम्परा का हिस्सा रही लोककथायें उनकी मौलिक कहानियाँ बन गई हैं। अद्भुत कल्पनाशीलता, सूक्ष्म पर्यवेक्षण, जागरूकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, पतनशीलता का विरोध और गहन मानवीय सरोकारों को विज्जी ने अपनी ऐन्द्रिक भाषा से ऐसा मंडित किया है कि उनका एक-एक वाक्य मानस पटल पर अंकित होता चला जाता है। कथानक को गौण बनाकर घटनायें इतनी प्रभावी हो जाती हैं कि पाठक मुग्ध भाव से उनके साथ आगे बढ़ता चला जाता है, और 'आगे क्या हुआ यह जानने के लिए उत्कंठित बना रहता है। आख्यानपरकता का उनकी कहानियों में ऐसा वितान निर्मित होता है कि भाषा, भाव और विचार के स्तर पर पाठक स्वयं को घिरा हुआ पाता है। इसी रचनात्मक सामर्थ्य के बल पर बिज्जी ने लोककथाओं की लोकपरकता या कहना चाहिए स्थानीयता को वैश्विक मानवता के सन्दर्भ दे दिए हैं।

 

वैसे लोककथाओं की विश्वसनीयता उनमें चित्रित स्थानिक परिवेश में निहित होती है। लोककथा के सम्पूर्ण तत्त्वों को सुरक्षित रखते हुए उसे सजीव और सशक्त बनाकर बिज्जी कथा के लिखित रूप में उन जीवन सत्यों और मूल्यों की ओर संकेत करते हैं, जो जीवन को भव्य एवं गरिमामय बनाते हैं। साथ ही उन विकृतियों, गर्हितपन और अनैतिकता को दिखाते हैं, जिनसे मानवीय जीवन शर्मिन्दगी झेलता है। लोक चेतना को प्रस्तुत करने की कोशिश में बिज्जी अपनी कहानियों को उस बिन्दु पर ले जाते हैं, जहाँ से कहानी खुद को गढ़ने लगती है और कहानीकार केवल 'नैरेटर' होकर रह जाता है। बिज्जी लोक व्यवहार के शिल्पी है। उनकी कहानियों में जो जीवन निरूपित हुआ है, उसमें राज्य सत्ता के प्रति घोर उपेक्षा और तिरस्कार का भाव व्यापक पैमाने पर मौजूद है। वहाँ पग-पग पर साधारण लोग अपनी शक्ति, समझ और सामाजिक सरोकारों से राज्यतंत्र को खोखला, पाखण्डपूर्ण और भय के भ्रम से परिचालित सिद्ध करते हैं। राज्यतंत्र से जुड़े भय का वातावरण बनाने में व्यवसायी, पुरोहित और दरबारी मनोवृत्ति के लोगों की जन विरोधी भूमिका को भी उन्होंने मौके-बे-मौके उजागर किया है। उल्लेखनीय है कि यह सब बिज्जी ने पशु-पक्षियों के बहाने किया है, यानी उनकी कहानियों 'फेबल्स' की बुनावट में आश्चर्यलोक निर्मित करती हैं।

'बाता री फुलवाड़ी' के तेरह खण्डों में उन्होंने जो लोककथायें संकलित की हैं, वे वस्तुतः आम लोगों से उनके द्वारा सुनी हुई कहानियाँ हैं। स्पष्ट है कि आम लोगों ने उन कथाओं को ठीक उस रूप में नहीं सुनाया होगा, जिस रूप में बिज्जी ने उन्हें लिपिबद्ध किया है। सुनी हुई कहानी को लिखते समय बिज्जी ने भी उसमें अपनी ओर से काफी कुछ जोड़ा-घटाया होगा। यानी फुलवाड़ी की लोककथायें भी कमोबेश उनकी रचनाशीलता की द्योतक हैं। लोक कथा को बीज के तौर पर ग्रहण करके उसे फला-फूला विशाल पेड़ बनाने के लिए जो खाद-पानी काम में लिया, वह सर्वथा उनका अपना है। इसलिए यह कहना अन्यायपूर्ण है कि बिज्जी की कहानियाँ मौलिक नहीं है। उनकी कहानियों में लोककथायें उसी तरह विद्यमान है जैसे हमारी महान रचनाओं में प्राचीन आख्यान। उन लोककथाओं में समकालीन जीवन यथार्थ के लिए 'स्पेस' तलाश लेना भी मौलिकता है।

बिज्जी की कहानियों को हम पुरानी बोध कथाओं की सगी बड़ी बहनें कह सकते हैं। बोध कथाओं में किसी लोक व्यवहार की ओर केवल संकेत भर होता है। वहाँ यह नहीं बताया जाता कि भूखा व्यक्ति कोई भी पाप करने से क्यों नहीं हिचकता? वे कौनसी परिस्थितियाँ होती हैं, जो उसे भूखा मरने के लिए विवश करती हैं और ऐसी परिस्थितियों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? बिज्जी ने इन प्रश्नों के उत्तर खोजते हुए लोककथाओं को बड़ा बनाया है। लोक व्यवहार के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं की खोज की है। इसलिए वे बोध कथाओं की बड़ी बहने हैं। प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध 'वार्त्ताओं' को इन लोक कथाओं और बोध कथाओं का आरम्भिक रूप माना जा सकता है। उनमें कल्पना की जो उड़ान रहती थी, वहीं गल्प का आधार बनी। गल्प गढ़ते हुए बिज्जी ने जहाँ कल्पना को विस्तार दिया, वहीं अपने सपनों को भी साकार किया। उनमें तरह-तरह के रंग भरे। सपनों के द्वारा जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को प्रकट किया। जीवन के प्रति बिज्जी की धारणाओं और आकांक्षाओं का मूर्तिमान रूप उनकी कहानियों है। लोक जीवन की जाने कितनी ही गौरवमयी भ्रान्तियों को लेकर अपनी गल्य रचनाओं को उन्होंने व्यंग्यात्मक छटा दी है। ये भ्रान्तियाँ उनकी कहानियों की रीढ़ हैं। देखा जाए तो रचनात्मक यथार्थ और वस्तुगत यथार्थ के बीच यह विभ्रम ही वह पार्थक्य रेखा बनता है, जो दर्शाता है कि रचनाकार ने किस सीमा तक जाकर यथार्थ का पुनसृर्जन किया है।

बिज्जी की कहानियों में आख्यानपरकता के अलावा किस्सेबाजी का कौशल भी मिलता है। यह ठीक वही शैली है जो सिंहासन बत्तीसी, वैताल पच्चीसी' या हातिमताई और अलिफ लैला के किस्सों में मिलती है। हिन्दी में प्रेमचंद इस शैली के प्रभावी प्रयोक्ता रहे है। इस शैली में रचनाकार खुद किस्से का हिस्सा बनकर उसे रोचक, उत्सुकतापूर्ण और विश्वसनीय बनाता है। नाटकीयता इन किस्सों को गतिशील बनाये रखने का काम करती है।

बिज्जी की कहानियों के कथासूत्र ठीक वैसे ही है जैसे दादी-नानी की कहानियों में हुआ करते थे। जिन्हें हम कथा सूत्र कहते हैं, वे और कुछ नहीं बल्कि वे कल्पित तत्त्व है, जिनके द्वारा कहानियों को विकसित कर अंत की ओर ले जाया जाता है। जो है उसमें से जो होना चाहिए' की संभावना तलाशना या कहना चाहिए घटित यथार्थ में से संभावित यथार्थ की खोज करके उसके लिए 'स्पेस पैदा करने में जिन तत्त्वों का उपयोग किया जाता है, वे सब कथा सूत्रों की श्रेणी में आते हैं। बिज्जी की 'सपनप्रिया' कहानी के हवाले से इसे ज्यादा स्पष्टता से समझा जा सकता है।

'सपनप्रिया' कल्पना और यथार्थ में से यथार्थ की स्वीकृति की कहानी है। राजकुमार अपने सपने की कुंकुमवर्णी पद चिह्नों वाली राजकुमारी के लिए क्रियाशील होता है। उसके माता-पिता भी जीवन यधार्थ को समझाने के लिए उसे सपने वाली राजकुमारी की खोज के लिए प्रेरित करते हैं। सपने को साकार करने की कोशिश में राजकुमार जीव मात्र के प्रति करुणा और सहयोग करना सीखता है। उसे लगता है संकट के समय किसी के लिए किया गया सहयोग कभी अकारथ नहीं जाता। सपनों को साकार करने के लिए भी निष्ठा, समर्पण और अनन्यता चाहिए। कहानी में सपना कुंकुमवर्णी पदचिह्नों वाली राजकुमारी है और यथार्थ दीवान की बेटी, जो वस्तुतः राजा की अवैध सन्तान है। यहाँ पर देथा जी सामन्ती समाज के कटु यथार्थ और विवाहेतर संबंधों की विकृतियों को दिखाते हैं। राजा की बेटी होते हुए भी राजकुमारी की बहन को वह अधिकार हासिल नहीं है, जो राजकुमारी को है। राजकुमारी की बहन उससे अधिक सुन्दर, समझदार और संवेदनशील है। वह राजकुमार को चाहती है, लेकिन राजकुमार सपनों वाली कुंकुमवर्णी पदचिह्नों वाली राजकुमारी के पीछे पागल है। सपनप्रिया की अपनी शर्तें है। उन्हें पूरा करने वाला ही उसका वरण कर सकता है। यहाँ देथा जी ने नाटकीयता और कल्पना का भरपूर उपयोग किया है। राजकुमारी को पाने के लिए जिन शर्तों की कल्पना की गई है वे उन प्राणियों की गतिविधियों से जुड़ी हैं, जिनकी राजकुमार ने समय-समय पर सहायता की थी। एक कथासूत्र का सिरा यहाँ आकर दूसरे से मिल जाता है। प्राणियों के सहयोग से राजकुमार सभी शर्तें जीत जाता है। राजकुमारी को ब्याह के लिए तैयार होना है। वह माँ के पास जाती है और अपने मरने के बाद शव को न जलाने के लिए माँ से कहती है। उसके मरने की वजह तहखाने में रखा वह नौलखाहार है, जिसे तहखाने में रखे संदूक से निकालकर उसकी सौतेली बहन ने पहन लिया है। राजकुमारी के मर जाने पर राजा अपनी अवैध सन्तान को राजकुमार से ब्याह देता है। सपना पीछे छूट जाता है। यथार्थ सामने है। वह बुरा भी नहीं है। लेकिन यथार्थ की स्वीकृति यदि छद्म के साथ हो, तो यथार्थ को बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है। सौतेली बहन हार को ज्यों ही गले से उतारती है, राजकुमारी जीवित हो जाती है। इसलिए सौतेली बहन ने इस छद्म के साथ न जीने का निश्चय कर राजकुमार को उसके सपनों की राजकुमारी से मिला दिया। उसने अपने गले का हार ज्यों ही राजकुमारी को पहनाया वह फिर से जी उठी। कहानी यहाँ कई प्रश्नों के साथ खत्म होती है। पाठक सोचता है कि इसके बाद राजकुमार ने किसे अपनाया होगा? कुंकुमवर्णी देहधारी सौतेली बहन को या आभूषणों के बूते जीने-मरने वाली कुकुमवर्णी पदचिह्नों वाली राजकुमारी को।

मानवीय संवेदनाओं को नकार कर जानलेवा सपनों के पीछे दौड़ने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता। जिन शर्तों को पूरा करने में ही जीवन खप जाये, तो ऐसी शर्तों और शर्त रखने वालों की समझ पर तरस ही आ सकता है। कहानी मानवीय भावों के साथ जीने वाली सौतेली बहन और शर्तों व आभूषणों के लिए जीने वाली सपनों की राजकुमारी में से चयन का विवेक जगाती है। साथ ही इस सच्चाई को भी उजागर करती है कि राज्य सत्ता यथार्थ में कम और सपनों में ज्यादा विश्वास रखती है। वह कल्पना में, सपनों में और जो संभावित है, उसमें ज्यादा रूचि लेती है। नतीजतन वर्तमान का चेहरा सँवर ही नहीं पाता है। ठकुर सुहाती, दरबारीपन, चापलूसी, झूठी शान राज्य सत्ता का चरित्र बन जाती है। बिज्जी के घनिष्ठ मित्र और कलाविद् कोमल कोठारी के अनुसार 'विजयदान देथा की कहानियों में राज्य कथा का नायक नहीं बल्कि सामाजिक, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में स्वयं सिद्ध एवं चिरन्तन नायक है।' (प्रतिशोध पृ. 21) यह नायक अपनी अकथ क्रूरताओं, मूर्खताओं और निष्कृटताओं के साथ वहाँ मौजूद है। कहीं पर हिंस्र पशुओं के प्रतीक रूप में और कहीं लोकतंत्र में पनपती सामन्त शाही के रूप में।

लोकविश्वासों को आधार बनाकर बिज्जी ने कई अ‌द्भुत कहानियाँ लिखी हैं। 'भगवान की मौत' के तीडा का शगुन विचार या 'दुविधा' की नव-नवेली दुल्हन का भूत से प्रेम प्रसंग ऐसे ही लोक विश्वास हैं। बिज्जी के कथापात्र वर्गीय चेतना के साथ मिथकीय चेतना से भी सम्पन्न है। इन दोनों में सामान्य तत्त्व सामूहिकता है। सामंती और पूंजीवादी मूल्यों में रचा-बसा समाज मानवीय मूल्यों का महत्त्व नहीं समझता। वह तो एक दिन ईश्वर के दिवालिया होने का सपना देखता है। बिज्जी की कहानियों का 'पैटर्न' फेबल्स या पशु-पक्षियों की कहानियों की फंतासी से निर्मित है। यह फंतासी कहीं आश्चर्यलोक रचती है, तो कहीं भूतों को जिन्दा इंसानों से अधिक संवेदनशील दिखाती है। फंतासी को आवश्यकता के अनुसार समसामयिक सन्दर्भों में सहज कहनपन के साथ प्रस्तुत कर देने का कौशल कोई बिज्जी से सीखे। यह कहनपन ऊपर से जितना सहज-सरल दिखता है, उसके निहितार्थ उतने ही व्यापक, सूक्ष्म और गहन होते हैं।

 

किस्सों या धार्मिक कथाओं में जैसे हर दुख का अंत सुख में, संघर्ष का सुकून में या व्यथा का आनन्द में दिखाया जाता है, वैसे ही बिज्जी की कहानियाँ भी 'अन्त भला तो सब भला' को चरितार्थ करती हैं। लोककथा को कहने का ढंग उनकी कहानी के शिल्प को तय करता है। 'फेंफा के फूल' कहानी की नायिका, एक बावड़ी में रहती है। वह लम्बे समय तक सोती है और लम्बे समय तक जागती है। उसकी सुरक्षा के लिए विकराल पहाड़ हैं। बत्तीस भैरव और चौसठ जोगनियों का पहरा है। पलंग के चारों पायों के साथ चार सिंह अपलक बैठे हैं। कहानी में फैंटेसी का उत्कर्ष वहाँ होता है, जब पता चलता है कि फेंफा का फूल न किसी बेल पर मिलता है, न किसी पेड़ पर, न किसी पौधे पर। वह तो राजकुमारी फेंफा की मुस्कान में, उसके हँसने में मिलता है। दरअसल राजकुमारी फेंफा की हँसी राज्य सत्ता के वे तौर तरीके हैं, जो प्रजाजनों को बड़ी से बड़ी तकलीफ को भूल जाने का विभ्रम रचते हैं।

व्यंग्य बिज्जी की अभिव्यक्ति को विशेष तेवर देता है। उन्होंने कोई स्वतंत्र व्यंग्य कथायें लिखी हो, ऐसा नहीं है। लोककथाओं को विस्तार देने के दौरान ही उन्होंने व्यंग्य को अपनी रचना शक्ति बनाया। इस शक्ति को उनकी वाक्य रचना के बीच में खोजा जाना चाहिए। कागपंथ कहानी में अकाल की भयावहता को काँव-काँव करते कौओं द्वारा निश्चेष्ट जानवरों की देहों पर चोंच मारकर मजे लेने में व्यंग्य देखा जा सकता है। कौओं के चोंच मारने पर जानवरों के पूंछ न हिलाने का जिक्र करते हुए कहते हैं: पूछ हिलाने के लिए भी ताकत चाहिए।' इस छोटे से वाक्य में निहित व्यंग्य ने जीवन के न जाने कितने पक्षों को अपने निशाने पर ले लिया है।

उत्तरआधुनिक स्त्रीविमर्श के लिए बिज्जी की कहानियों में पर्याप्त संभावनायें हैं। ग्रामीण स्त्री, सामंती समाज में स्त्री, नवधनाढ्य वर्ग में स्त्री. कृषक स्त्री, इनकी सामाजिक स्थिति, उनकी निजता, शारीरिक-मानसिक शोषण, उनकी खरीद-फरोख्त, भोग्य वस्तु में तब्दील हुआ उनका व्यक्तित्व और स्त्री-विद्रोह जैसे प्रश्नों को विस्तार के साथ उन्होंने कहानी का विषय बनाया है। सामाजिक विकृतियों, कुप्रथाओं, अन्ध-विश्वास और पतनोन्मुख समाज की मनोरचना का बिज्जी ने बड़ा सूक्ष्म विश्लेषण किया है। ग्रामीण यथार्थ कितना विकट और संघर्षपूर्ण होता है, यह उनकी कहानियों से भली भांति समझा जा सकता है। ग्रामीण समाज का ऐसा प्रामाणिक और ऐतिहासिक अध्ययन कम ही कहानीकारों ने किया है। लोककथाओं की महान सम्पदा को लिपिबद्ध करके बिज्जी ने भारतीय समाज की ऐतिहासिक विकास यात्रा को सुरक्षित किया है। इस देश की सृजन परम्परा को यह उनकी अनूठी देन है।

मंगलवार, 23 जनवरी 2024

दोस्ती- भास्कर चौधुरी


 

जब एक बूढ़ा

और एक बच्चा

मुस्कुराते हैं साथ-साथ

तो समझना चाहिए

कि दुनिया अभी उतनी बुरी नहीं है

जितना हम समझ बैठे हैं

दोस्ती

दोस्ती

बच्चे की बच्चे से

अभी टूटी

अभी जुड़ी

बच्चे ने दोस्त का नाम लिया

नींद में

और खिलखिलाया

बच्चे ने दोस्त से

नींद में

छीनाझपटी की

बाल नोचे

एक लात जमाया हवा में

ज़रा सा सुबका भी

बच्चे के पिता ने

बच्चे को अलग किया दोस्त से

और कार में ले उड़े

अपने दोस्त के घर जाने को

रोता रहा बच्चा देर तक...

 

सोमवार, 22 जनवरी 2024

खुशहाल परिवार की औरतों के रोज़गार नहीं होते- मनीषा सिंह 

आदमी मना कर देता है ख़र्च देने से,

औरतें बना कर अचार -मंगौड़ी या टोपी क्रोशिया की बेचने लगती हैं दोपहर की नींदें

आदमी का हाथ तँग हो तो औरतों के बटुए छोटे होते जाते हैं

ये बटुए उनकी कांचली या फिर ब्लाऊज़ में ही कहीं छिप जाते हैं

मानो कलेजा हो उनका

आदमी कहता है फीस बढ़ गई है बच्चों की औरतें दूध लेना कम कर देती हैं

जो औरत कल तक बच्चों को कहती थी दूध पीने से दिमाग़ तेज़ होता है

अचानक बच्चों को समझाने लगती है

चाय पीने से कैसे सुस्ती उड़ जाती है

आदमी का धंधा जब अच्छा चलता है तब वह अपने घर की औरतों को मना कर देता है धूप में निकलने से

जैसे ही तंगी हो जमी धूल वाली डिग्रियों को लेकर अदद टीचर बनने निकल पड़ती हैं औरतें घर से

बहाना बना देती हैं मन नहीं लगता अब बच्चे जो बड़े हो गए हैं

अमीर घर की औरतें अगर नौकरी करें तो ताज़्ज़ुब होना चाहिए

ये तो बड़ी हिम्मत का काम है

उस पर भी अगर नौकरी हो 4 से 5 शून्य वाली तो अजूबा ही है

आदमी की तंगहाली ही बनी है औरतों का रोज़गार

खुशहाल परिवार की औरतों के रोज़गार नहीं होते हैं

यूं ही है औरतों का मालकिन बन जाना

ये दुनिया अजूबा

ये दुनिया तहखाना

आदमी नमूना

औरत बस जैसे तैसे कोई सतूना

 

सुख-दुख- विजय राही

सुख-दुख

 

एक घण्टे में लहसुन छीलती है

फिर भी छिलके रह जाते हैं

दो घण्टे में बर्तन माँजती है

फिर भी गंदे रह जाते हैं

तीन घण्टे में रोटी बनाती है

फिर भी जली, कच्ची-पक्की

कुएँ से पानी लाती है

मटकी फोड़ आती है

जब भी ससुराल आती है

हर बार दूसरी ढाणी का

रास्ता पकड़ लेती है

औरतें छेड़ती हैं तो चुप हो जाती है

ठसक से नहीं रहती बेमतलब हँसने लगती है

खाने-पीने की कोई कमी नहीं है

फिर भी रोती रहती है

"काँई लखण कोनी थारी बहण में"

यह सब

बहन की सास ने कहा मुझसे

चाँदी के कडूल्यों पर हाथ फेरते हुए

जब पिछली बार बहन से मिलने गया

मैंने घर आकर माँ से कहा

बहन पागल हो गई है

सास ने उसको ज़िंदा ही मार दिया

कुएँ में पटक दिया तुमने उसे

माँ ने कहा

लूगड़ी के पल्ले से आँखें पोंछते हुए

"तू या बात कोई और सू मत कह दीज्यो

म्हारी बेटी खूब मौज में है !"

 

 

 

इलाहाबाद से साहित्य की बारीकियां सीखे उपेन्द्र यादव - जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज


                                            इलाहाबाद से साहित्य की बारीकियां सीखे उपेन्द्र यादव                                      ............................
                             जयचन्द प्रजापति 'जय'प्रयागराज

    हिंदी साहित्य के युवा कवि उपेंद्र यादव एक उभरता नाम जो साहित्य में इनकी रुचि इलाहाबाद से ही उपजी। इलाहाबाद की साहित्य नगरी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए की पढ़ाई की। इनकी बहुत सुंदर तथा भाव पूर्ण रचना होती है। सरल स्वभाव के उपेन्द्र यादव साहित्य का अंकुर इलाहाबाद में रह कर बारीकियां सीखी और लिखने की तरफ रुझान बचपन से था। इस तरह इलाहाबाद से ही साहित्य को नया रंग देने लगे। इनकी एक रचना...

पतंग उड़ाता बचपन

दीवारों और छतों पर संतुलन बनाए

डोरी और पतंग को साधते-साधते

एक दिन जीवन को साधना सीख लेता है।

जयराम यादव इनके पिता का नाम हैं। माता श्रीमती तारा देवी हैं। उपेंद्र यादव का स्थायी पता- ग्राम-चकहुसाम, पोस्ट-बीकापुर, जिला-गाजीपुर, उत्तर प्रदेश है। उपेंद्र यादव का जन्म दो जनवरी 1984 को हुआ था। रेलवे में ग्रुप-C के तहत अमृतसर में टेक्निशियन ग्रेड-1 पद पर कार्यरत हैं।

'तुम्हारे होने से' काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। 'जीवन ज्योति' नामक साझा काव्य संग्रह में कविताएँ शामिल, 'मोहब्बतें' नामक साझा संकलन में कविताएँ प्रकाशित, 'नूर की दुनिया' नामक साझा संकलन में कविताएँ सम्मिलित तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में फुटकर कविताएँ एवं लेख प्रकाशित हुए हैं।

कविता वाचन अनेक संस्थाओं के कार्यक्रम में कविता वाचन करने का सौभाग्य प्राप्त है। पुरस्कार- 'ग्रेट स्पोर्ट्स कल्चरल क्लब इण्डिया' द्वारा पुरस्कृत, 'वांग्मय क्षितिज: एक साहित्यिक उपवन' द्वारा सम्मानित, 'भारतीय रेलवे' के अलावा 'साहित्य चेतना समाज', 'शारदा ज्योति समाज' तथा अन्य संस्थाओं द्वारा समय-समय पर पुरस्कृत एवं सम्मानित हुए हैं।

औरतें- पल्लवी मुखर्जी


 

औरतें

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औरतें

जो हो गई हैं संसार से विरक्त

दुख की आत्यंतिकता की वजह से

भटक रही हैं इधर-उधर

अपने नन्हे बच्चों को

छाती से चिपकाए

बच्चों की देह

उधड़ चुकी है बमों के हमलों से

और फैल गई है गंध

कच्चे माँस की चारों ओर

बेसुध बच्चों को

किसी तरह थामे

तलाश रही हैं औरतें

बच्चों के पिता को

मलबे के हज़ारों ठीहों में

बचा लेना चाहती हैं औरतें

अपने भीतर के

दम तोड़ रहे विश्वास

और आशा को

धरती की हरियाली

और घरौंदों को

कर रही हैं औरतें

अपनी आवाज़ बुलंद

दुख के सागर में डूबे

प्रेम के टापू पर

मज़बूती से अपने पाँव टिकाकर ....

स्त्री... सृष्टि... सौन्दर्य - डॉ.वंदना गुप्ता शिक्षाविद् और साहित्यकार


 

स्त्री... सृष्टि... सौन्दर्य

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कलाकार की आंखें ,कभी मरती नही है

रहती है जिन्दा अनन्त काल तक....

टिकी होती है सृष्टि के रहस्यों पर

स्त्री के भावात्मक स्पंदनों पर

कल्पना, कोमलता, सौन्दर्य में

लिपटा उसका ऋषित्व भाव

गढ़ता है कई अनोखी कला-छवियां...

इतिहास के निश्चित बिन्दुओं पर

बनी उसकी कलाकृतियां

अपना रास्ता तय कर

जुझती है खुद से...

फिर कटघरे में खड़ी

करती हैं ज़िरह आस्था -अनास्था,

पाप - पुण्य के सवालों पर ...

तलाशती है नयी जमीन

ऐसे में अपनी सघन, दुर्लभ

कल्पनाओं के परों को

हर्फ़ हर्फ़ सीमाओं में समेटना

कितना मुश्किल होता होगा उसके लिए

इसे एक कलाकार से ज्यादा कौन जान सकता है

स्त्री... सृष्टि... सौन्दर्य में

रची-बसी उसकी सूक्ष्म दृष्टि

पानी पर लकीरें खी़चने की

भावात्मक मन: स्थिति

तपस्या सी परिकल्पनाएं...

काग़ज़ी घोड़े पर सवार

जीवन के अन्तिम छोर पर

हो जाती हैं प्रवासी...

और त्रासदी की यात्रा तय कर

करती हैं अकल्पनीय मृत्यु का वरण...

पर कलाकार की आंखें

मरती नहीं है रहती है जिन्दा

सृष्टि के अनन्त काल तक

तलाशती है सृष्टि का छोर-छोर

बचाएं रखती हैं उसका सौन्दर्य

जन्म -जन्मातर तक...।

रविवार, 21 जनवरी 2024

मोकों कहां ढूंढे बंदे -----------(२) - राजेन्द्र कसवा


                                             मोकों कहां ढूंढे बंदे -----------(२)

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वैदिक कालीन संस्कृति असली भारत में तो कम से कम बीसवीं सदी के अंत तक बची रही। आमजन परस्पर अभिवादन के लिए राम-राम का उच्चारण करते रहे,आज भी कर रहे हैं। पूरे अभियान के बावजूद 'जयश्री राम' गांवों में नहीं पहुंचा। और ये राम-राम कौनसा? जैसा कबीर साहेब ने कहा -ये राम-राम दशरथ पुत्र राम नहीं है। अलौकिक शक्ति का नाम है, जिस पर ही रामचंद्र नाम रखा गया। बीसवीं सदी के अंत तक गांवों में अधिकांश लड़कों के नाम राम से जुड़े हुए थे।

वैदिक कालीन सभ्यता के पश्चात रामायण काल और महाभारत काल बताया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इन्हें त्रेता और द्वापर युग कहा गया। संयोग वश सोशल मीडिया में एक पोस्ट वायरल हो रही है। एक मुकदमा चला 'ललई

सिंह यादव बनाम यूपी सरकार ' के नाम से।इसकी अपील सुप्रीम कोर्ट में हुई जिस पर निर्णय तीन जजों की पीठ ने १६-९-१९७६ को दिया। निर्णय के अनुसार रामायण नाम के जितने भी ग्रन्थ हैं,उनका कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है।न ही इसमें वर्णित घटनाओं का साक्ष्य है। अतः रामायण और इसमें दर्शाये गये सभी पात्र पूर्णतया काल्पनिक हैं।

हमारा विश्व गुरु दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है, जहां काल्पनिक पात्र को ईश्वर मानने के लिए जनता को हांका जा रहा है,डराया जा रहा है। कहां तो रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य की बात करनी थी,हम तो सिर के बल चलते हुए पौराणिक काल में जाने को अभिशप्त हैं।

ऐसी रूढ़ परम्परा को कोई नहीं माने तो आस्था को चोट कैसे पहुंचती है।

इसी प्रकार महाभारत काल में जो विकृतियां समाज में थी,वो आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। क्योंकि जुआरी युधिष्ठिर को धर्मराज बना दिया गया। ऐसा धर्मराज, जिसने अपनी पत्नी और भाइयों को दांव पर लगा दिया। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, विष्णु के अवतार भी माने गए।वे चाहते तो कुटिल अहंकारी दुर्योधन को कान पकड़ कर दरबार से निकाल सकते थे। पूरा हस्तिनापुर उनके साथ होता। महामंत्री विदुर विद्रोह कर सकते हैं लेकिन भीष्म लुंजपुंज बने रहे।

इन दोनों महाग्रंथों से हम क्या प्रेरणा लें?

रामायण और महाभारत बुद्ध से पहले रचे गए या बाद में, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। लेकिन सिंहासन को ठोकर मारकर बुद्ध ने समाज को जगाने का जो बीड़ा उठाया, वैसा दूसरा कोई उदाहरण हमारे ढाई हजार साल के ज्ञात इतिहास में नहीं मिलता।(क्रमशः)