बुधवार, 17 जनवरी 2024

सौन्दर्य- सोमनाथ शर्मा कवि एवं साहित्यकार










सौन्दर्य

    ___

 मेरे लिए,

कभी सब सुंदर था,

सृष्टि में !

अनिंद्य...चित्ताकर्षक

बड़ा ही रोमानी,

सुंदर, सुघड़ कल्पनाओं के अनंत आकाश-सा !

 मैं उड़ता रहा,

स्वप्नों में रंग और सौंदर्य भरता रहा !

हृदय की कूची लिए चित्र गढ़ता रहा,

और इस कलाकारी पर आनंदातिरेक से उमड़ता रहा !

 मैनें फूल देखे,

मैं महका और लहकने लगा

चिड़िया देखी,

मैं बहका और चहकने लगा !

सागर-सी विस्तृत,लहराती हरी चादर देखी

मैनें ओढ ली, हरियाली जोड़ ली !

मैं आच्छादित हो गया,

घटाओं से,

थरथराकर पुलक गया बिजलियों से,

मैं तरबतर हुआ,

अंतस तक,

गुनगुनाती धूप और रिमझिम बूँदों से !

 साँझ मेरी बरौनियों में मोरपंखियाँ बाँध गई,

सितारों की एक झालर टॉंग गई !

भोर, कुमकुम और हल्दी की थाली सजाए,

दीपक से मेरी आरती उतार गई !

मैनें पत्तियों पर ओस बिंदु देखे,

पिघलते मोती देखे !

तितलियाँ मुझे फूलों से मिला गईं,

नाज़ुक सा बदन हाथों में थमा गईं !

इस तरह...

और भी न जाने किस-किस तरह,

मैं मुग्ध, आत्मतुष्ट

 डूबा रहा सौंदर्य में, आनंद में !

 लेकिन जब आँधियों में उखड़े क्षत विक्षत दरख्त देखे,

मिट्टी को गहराई तक चिरसमाधि में जकड़े बैठी भयावह जड़ें देखीं,

आकाश का पथराया पीलापन देखा,

ओस की बूँदों में रात भर टपके आँसुओं का निरीह अकेलापन देखा,

साँझ के झुटपुटे में हारी थकी लौटती प्रतीक्षाएँ देखीं,

पेट के शाश्वत सवाल पर दमघुटी इच्छाएँ देखीं,

तो सुन्दरता,सुघड़ता,

और कोमलता

चीख पड़ीं,

उठकर हुई भाग खड़ी !

आनंद में डूबा मैं मतिमंद लगने लगा,

हृदय का अतिशय कुंद लगने लगा ! 

भगौड़े पुरुष-   मनीषा सिंह कवयित्री और लेखिका



 



छोड़ी हुई औरतें अक़्सर बहाना बन जाती हैं गैरज़िम्मेदारियों का ,

उनको कारण नहीं बताये जाते छोड़े जाने के ,

उनको बेवज़ह ही साबित कर दिया जाता है!

बरसों से किसी कोने में रोती रही औरतें ,

जिनसे किसी ने नहीं पूछा  उनका हाल,

किसी को परवाह नहीं थी जिनके बेहाल होने की ,

उनको छोड़ते समय अक़्सर कोई पुरुष रौब दिखाता है !

छोड़ी हुई औरतों का हंसना, जीना तक भी संदिग्ध हो जाता है!

पुरुष चाहता है स्त्री एक बेल हो जाए,

स्त्री का खुद का एक वृक्ष हो जाना ,

धरती तक छीन लेता है उसके हिस्से की !

एक उम्र निकलने के बाद उनको त्याग दिया जाता है,

इस तरह जैसे कोई चादर हो,

जिसे पुराने सामान को ढंकने में काम लिया जाएगा,

अब लायक नहीं लगती छोड़ी हुई औरतें ,

न ही सजा सकती हैं अब किसी भगौड़े पुरुष की दुनिया !

 


(कहानी)- चौकीदारिन माई-  केदार शर्मा,”निरीह’’ सेवानिवृत व्याख्याता (अंग्रेजी)


 

चौकीदारिन माई

 

 गाँव में सब चौकीदारिन माई कहते थे उसे ।  सुनते थे कि वहाँ के नवाब ने उसके पति को अपने इलाके का चौकीदार नियुक्त किया था।लम्बी मूँछे, विशाल कद काठी,गठीला शरीर,रोबदार चेहरा । घोड़े पर बेठकर  निकलते तो चोर डाकुओं की रूह काँप जाती थी । अब तो उनको गुजरे अरसा हो गया। चौकीदारिन माई उनकी दूसरी पत्नी थी और उनसे करीब दस साल छोटी थी

     मध्यछम कद-काठी, गाँव की सादगी-भरी वेश-भूषा, पैरो में चाँदी की मोटी-मोटी कडि़याँ, गौर वर्ण, ललाट पर चंदन का पीला टीका,चेहरे पर वृद्धावस्था को दस्तक देती झुर्रियां, माथे पर चाँदी से चमकते श्वेात केश,पर चाल और आवाज में युवतियों जैसा जोश । कुल मिलाकर यह था चौकीदारिन माई का रूप ।वैसे तो वह बेटे-बहुओं के पास रह रहीं थी, पर घर पर वह मुशिकल ही रुक पाती थीं।

        दाई भी थी,तो घरेलू नुस्खों का खजाना लिए नर्स भी ।परम्पराओं को समझने वाली विशेषज्ञ भी थी, तो गाँव भर की महिलाओं  के लिए एक सास,सखी-सहेली ओर भरोसेमन्द सहायक भी  थी । कभी-कभी महिलाएँ  हँसी ठिठोली करतीं—‘’माई, भगवान  ने एक साथ सारे  गुण आपको ही क्यों दे दिए? हमसे  क्या दुश्म नी  थी?’’

    माई हँसकर रह जाती—‘’ अच्छा हुआ मेरी बहना, नहीं तो चक्करधिन्नी  हो जाती, मेरी तरह । पर जो चाहता है वह सीख जाता है । बिना गुणों  के तो इंसान रद्दी कागज से भी बदतर है ।

              रामू को याद आ रही थी वह भयकंर रात,जब उसकी माँ पाँच बच्चों को छोड़कर चल बसी थी।  दो भाई और दो बहिनें  उससे छोटे थे।पिताजी बाहर नौकरी करते थे । वह खुद पास ही के शहर में किराए का कमरा लेकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था।छह महीने पहले ही माँ ने जिद करके उसके हाथ पीले कर दिए थे ।अब उसके परिवार पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा था ।गृह-लक्ष्मीव  की जिम्मेदारी उसकी पत्नी राधा पर आ गयी थी,और वह भी पन्द्रह वर्ष की वय में ।दिन तो किसी तरह निकल जाता था, पर जिस दिन वे दोनो बाप-बेटे नहीं होते थे, बच्चों को डर लगने लगता था । एक रात राधा चारों बच्चों के साथ छत पर सोयी हुई थी, कि अचानक एक बिल्ली कहीं से निकल कर चली गई ,तो सारे बच्चे डर के मारे चिल्ला उठे । आस-पास  के मौहल्ले वाले आधी रात को  भाग कर आए । दूसरे दिन सबने निश्चलय किया कि कुछ दिनों के लिए चौकीदारिन माई को धन्ना के घर सोने के लिए सहमत किया जाए। माई के बेटे-बहुओं से पूछा गया तो बोले —‘’वैसे  भी  सारे दिन गाँव में घूमती फिरती है,हमारे क्या  काम है? कहीं भी रहे, हमारी बला से । ‘’

        रामू के मष्तिष्कब  में एक चलचित्र अनवरत चल रहा था । कि कैसे दूसरे दिन से ही चौकीदारिन माई उनके परिवार का अंग बन गयी थी । शाम को  माई के आते ही आस-पड़ौस की औरतें ,बच्चों आदि का जमघट लग जाता । उसके पति की बहादुरी के किस्से,विपन्नता की घडि़यों में एक दूसरे पर जान देने के जमाने की बातें, गाँव के पंचों द्वारा गाँव में ही निपटाए गए बड़े-बड़े झगड़ों की कहानियाँ माई से खूब सुनने को मिल रही थी। दिन में तो माई को फुर्सत  ही नहीं मिलती थी ।कभी किसी के चेचक, हैजा, या न्यूमोनिया हो जाता था तो  माई को बुलाया जाता और माई रोगी को  तुलसी, सौंठ ,लौंग,काली मिर्च और न जाने किन  किन औषधियों का काढ़ा बनवाती। कमरा, बरतन,कपड़े सब अलग रखवाती । रोगी के कमरे और खाट के चारों पायों पर नीम के झूरे  बाँधती ।नीम की पत्तियों को उबाल कर उससे ही रोगी के हाथ-पैर धुलवाए जाते । ओर ईश्वोर( ईष्टक )  का नाम लेकर  झूरों से  झाड़ा लगाया जाता । चौकीदारिन माई पूरी तरह समझा कर ही आती। यदा-कदा उसकी देखरेख चलती  रहती ।

  आज तो सुबह ही सुबह छीतर आ बैठा । ‘’माई,चलो,  आज बेटी का गौना है । गहने,कपड़े,नेगचार का सारा काम तुम्हारे बताए अनुसार ही होगा । हमने तो लापसी पूड़ी और दाल का इंतजाम कर दिया है,बाकी तुम जानो,  तुम्हारा काम । ‘’

                 वहाँ से वापस आई तो घर पर दो-तीन ओरतें हँसली(गले की हड्डी) ठीक करवाने के लिए अपने अपने शिशुओं को लेकर बहुत देर से इंतजार कर रहीं थी ।

सुबह-सुबह माई मन्दिर अवश्या जाती थी। ईश्वपर में उनकी अगाध आस्था थी । साल में एक बार मन्दिर में कुछ साध्वियों का दल आता,दो- तीन दिन वहाँ प्रवचन होते । माई उनसे घंटो तक ज्ञान की बातें किया करती थी ।एक बार तो माई ने उनके साथ जाने का मन बना लिया था। परतुं  गाँव के सरपंच साहब ओर गणमान्य व्यक्तियों के समझाने  पर रुक गयी ।परतुं उनके आश्रम का पता ठिकाना लेकर बाद में फिर कभी आने का वादा कर लिया।

  मन्दिर में भी कोई न कोई महिला किसी न किसी काम  से माई का इन्तजार करती मिलती। उस दिन लछमा कह रही थी,माई क्या करूं,अब तो उसका पति रोज उसे मारने लगा है । माई गुस्से से लाल हो गई । बोली—‘’चल मेरे साथ , मैं करती हूँ इलाज उसका । माई को देखते ही लछमा का पति रतना सहम गया। वह सीधे रतना की आखों में आखें डालकर बोली — रतना, तेरे हाथ-पैर ऐंठ रहें  हों तो लड़ने के लिए मैं बता दूं नौजवान। देखती हूँ कितनी देर तक लड़ता है? इस डेढ़ पसली की औरत को मारते हुए तुझे लाज नहीं आती।मर्द है तो बराबरी वाले से लड़। लड़खड़ाती जबान से रतना इतना ही कह पाया—‘’ माई, यह मुझसे जबान लड़ाती है, मैं क्या करूं?

        तो जबान का जवाब जबान से दे । तू  जब काम नहीं करेगा ,सारे दिन पड़ा रहेगा तो वह कुछ तो कहेगी ही । अचानक माई ने रतना के हाथ में मन्दिर से लाया रामझारा रख दिया,—‘’कसम खा गंगा मैयाकी कि आगे से इसको नहीं पीटेगा। ओर उस दिन से लछमा की समस्या का हमेशा- हमेशा के लिए समाधान हो गया ।

        गाँव में जब तक नर्स बाई नहीं आयी थी तब तक माई ही प्रसव करवाती रही थी। पर अब माई सबको मना करने लग गई थी । कहती थी—‘’मेरे पास न तो वैसे साधन हैं न ही सुविधाएँ जो अस्पताल में हैं । यह संयोग था या किस्मत,पर माई द्वारा कराए सभी प्रसव निरापद हुए । कई किशोर अब भी कभी कोई उपलब्धि मिलने पर दम ठोककर कहते हैं,आखिर घुट्टी किसकी लगी है? चौकीदारिन माई की ।

                 रामू को याद आ रहा था रामधन के पोते के मुंडन का कार्यक्रम । बहुत बड़ा भोज रखा था रामधन ने ।पर सुबह से ही बादल छा गए कि अब बरसे  कि अब टपके ।सब घबरा गए । औरतें रोने लग गईं । पर माई ने सबको हिम्मत बँधाई —‘’कोई बरसात नहीं आएगी।  उसने  एक कोरा घड़ा लिया,उसे पानी से भरा,सकोरे से ढककर ऊपर नारियल रखा ,मुहँ से कुछ बुदबुदाकर मन ही मन प्रार्थना की और जमीन में गड़वा दिया। यह सब घर की महिलाओं ने माई की देखरेख में गोपनीय रूप से किया था। पुरूषों का प्रवेश वर्जित था।रामू को उसकी  छोटी बहिन ने चुपके से यह सब बाद में बताया था । इसे संयोग कहैं या रामधन की किस्मत कि दोपहर  बाद तेज हवा चली ओर देखते-देखते बादल उड़ गए । पर जस मिला चौकीदारिन माई  को । ओरतों ने माई के पाँव पकड़ लिए —‘’माई तेरा टोटका काम कर गया । पर माई ने इतना ही कहा- ‘’जब ईश्वर की कृपा होती है तो सब  अच्छा  ही  होता है,टोटके तो मन के समझाने की बातें हैं,री।‘ 

         विवाह के अवसरपर माई को दस दिन पहले ही लोग लेने आ जाते। विनायक स्थापना से लेकर गणेश विदाई तक के सारे कार्यक्रम चौकीदारिन माई की देखरेख में ही होते ।माई का काम केवल सलाह देना ,तरीका समझाना,और गलती करने पर कभी-कभी मीठी झिड़की देना था।मांगलिक गीतों की लय ,बोल और किस अवसर पर कौनसा गीत गाना है ,जैसी बातों में माई का ही निर्देशन  चलता था । माई की उपस्थिति ही अपने आप में कार्यक्रम की सफलता का आश्वाचसन था। कार्यक्रम समाप्त होने पर सम्मान से माई को विदा किया जाता। माई जो लाती बेटे बहुओं में बाँट देती ।

       रामू को याद आ रहा था कि जब वह शनिवार को घर आता तो माई से सारे किस्से सुनकर ही जाता।एक दिन उसने पूछा —‘’माई आपके लिए शहर से क्या लाऊँ?

     कुछ नही रे । उत्तर देने के बजाए माई ने अपनी लूगड़ी का पल्लू खोला और रूपयों का एक मोटा सा बंडल मुझे पकड़ा दिया ,बोली—इनको संभाल कर रख ले। पहले तो मै बेटे बहुओं को दे दिया करती थी। पर ये कुछ रूपए मैने मेरे लिए संभाल कर रखे हैं। मैं मांगू तब दे देना।अब मेरा मन इस गाँव से उचटने लगा है। कुछ नई पीढ़ी के लोग मुझे मूर्ख समझते हैं ।  लगता है वे साध्वियां मुझे अपने आश्रम में बुला रहीं हैं । इच्छा होती है बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप चली जाऊं।

    राधा बोली,  माई,  आप जाने की बात नहीं करें । यहाँ आपको क्या तकलीफ है । हम आपको एक संदूक ओर ताला-चाबी दे देते हैं ये रुपए आप  जब चाहो ले लेना, जब चाहो रख देना। रूपए गिनकर माई के सामने ही संदूक में रख दिए गए और चाबी माई को दे दी गई ।

    उधर पड़ोस के ही किशना चोघरी की बेटी का विवाह नजदीक आ गया । सो सुबह- सुबह ही वह माई को लेने आ गया ,बोला—‘’माई,कल से ही तुम हमारे  घर पर रहोगी ओर गणेश विदाई के बाद ही वापस आओगी। माई  कुछ जवाब देती उसके पहले ही उसी समय सरया  बाबा भी  अपनी  पत्नी  के  साथ वहीं पहुँच गया। सरया की पत्नी बोली ,माई, मैने तुम्हे मन्दिर में एक महीने पहले ही कह दिया था। कल पोती का ब्याह है सो साथ चलना होगा । किशना बोला—‘’माई को तो मै लेकर  जा रहा हूँ । दोनो में तनातनी बढ़ गयी । बात गाली.-गलौच से हाथापाई तक आ गयी । आस-पास के लोगों ने जेसे-तैसे करके उनको अलग किया ।

                  शाम को पंचायत बैठी। पंचों को इकट्ठा किया गया । दोनो पक्षों में पुरानी रंजिश थी । चौकीदारिन माई को भी बुलाया गया। किशना और हरखा ने अपने-अपने तर्क रखे । आपसी बहस और तनातनी चली।गढ़े मुर्दे  जमकर उखाड़े गए। माई समझ रही थी कि उसके बहाने दोनो पक्ष अपनी-अपनी भड़ास निकाल रहे हैं । माई को यह बात अंदर तक चुभ गयी । उसका मन खट्टा हो गया । 

पंचों ने कहा—‘’तू ही बता माई  तू कल किधर जाना चाहती है ? किशना चौधरी की बेटी के ब्याह में या सरया बाबा की पोती  के ब्याह में। माई दोनो हाथ जोड़कर बोली —‘’मेरे लिए तो दोनों ही बराबर हैं । मेरे लिए तो सारा गाँव बराबर है । जैसा पंचों का हुकुम होगा मैं  उधर ही चली जाउंगी ।‘

     अंत में पंचों ने फैसला चौकीदारिन माई पर ही छोड़ दिया। भोर होते ही माई स्वैच्छा से जिसके घर भी जाना चाहेगी वहाँ उसका स्वागत होगा। पर दूसरा पक्ष उसे कुछ नहीं कहेगा। हाँ, किसी को सलाह चाहिए तो माई सबके लिए कहीं भी तैयार रहती है। माई के लिए इस तरह से लड़ना मूर्खता से अधिक और कुछ नहीं है ।

            पंचों के फैसले के बाद माई बिना किसी से कुछ बोले सो गई ।राधा के पूछने पर माई का गला रुंध गया बोली- ये लोग अब मुझे मोहरा बनाकर लड़ रहें हैं। मैं कोई इनकी गुलाम तो नहीं हूं। थकी हुई और उदास मन माई की आँखों में आज नींद नहीं थी।

 सुबह भोर में राधा ने देखा तो माई की चारपाई खाली थी।रामू ने भी उसे सब जगह ढूँढा,पर माई नहीं मिली । अंदर माई की संदूक खुली पड़ी  थी और रूपए उसमें नहीं थे । माई के कपड़े भी वहां से गायब थे । कहीं सरया ,किशना या अपने बेटे-बहुओं के पास नहीं चली गईं हों।सारे लोग कौतुहलवश  एक दूसरे से पूँछ रहे थे,माई  कहाँ गई ? बेटों ने खूब ढूँढा पर माई कहीं नहीं मिली ।

        शाम तक भ्रम के बादल छँट गए —माई गाँव छोड़कर चली गई थी ।उसी आश्रम में जहाँ जाने का वादा माई ने साघ्वियों से किया था। सब किशना ओर सरया बाबा को बुरा-भला कह रहे थे। मोसम मैं जोरदार उमस थी । हर तरफ माई की चर्चा थी ।उस शाम महिलाओं को खाना नहीं भाया पर जिन्होनें भी खाया बेमन से खाया।

 

माघ मेले में एक दिन- जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज


 

माघ मेले में एक दिन

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 जयचंद प्रजापति 'जयप्रयागराज


माघ मेला आ गया चुपके से। इलाहाबाद का मेला तो क्या कहने। अब मेले की तैयारी जोरो से है। बल्लियां लग गयी। लाइटिंग हो रही है। जी भर जलेबी खाया जायेगा। क्या भीड़ होगी?  रौनक होगी। नये नये कपड़े निकाले जायेंगे। फैशन दिखाने का पूरा बहाना।

 बच्चें सब खुश नजर आ रहें हैं। अच्छे-अच्छे खिलौना खरीदा जायेगा। पुरूष भी तैयारी में लगे हैं। कपड़े इस्त्री कराये जा रहे हैं। नये - नये जूते खरीदने की तैयारी हो रही है। कुछ लोग सोच रहे हैं कि पुराने जूतों को पालिश कराकर काम चला लेंगे।

 औरतें भी खुश हैं सारे श्रृंगार के सामान खरीद ही लिया जाये तो कई महीनों तक नहीं लेना पड़ेगा। लाल-लाल, हरी-हरी चूडियां ठीक रहेगी। लाल हरी गुलाबी साड़ी में तो खूबसूरत दिखूँगी। मजा आ जायेगा। लल्लू के पापा देखकर खुश हो जायेंगे। बोलेंगे..बिल्कुल दुल्हन सी लग रही हो। बच के जाना कहीं कोई नजर लगा देगा तो ...

 आज मेला देखने हम चार बच्चों के साथ पत्नी भी सुबह से निकल पड़े। छोटा बच्चा उछल पड़ा पापा हाथी। ये-ये गुब्बारा--लाल-लाल। अरे ये क्या है? फुलकी पानी! बिटिया मेरी एक गुब्बारा खरीद ली। मजा आ गया। पापा कितना प्यारा गुब्बारा है।

 आगे जैसे बढ़े झूला दिखाई दे गया। बच्चे सब उछल पड़े। पापा झूला झूलेगें। नहीं-नहीं कोई नहीं झूलेगा। गिर जाओगे। हाथ पैर टूट जायेगें। पैसा बचाने के लिए बहाना किया। नहीं गिरेगें पापा। टूटेगे तो हमारे टूटेगें। बच्चों के जिद के आगे सब फेल। सब लोग झूले का आनंद लिया। मेरे अच्छे पापा मजा आ गया। आगे बढ़े। सब लोगों ने फुलकी पानी का मज़ा लिए।

 क्या जलेबी है पापा ले लो। मम्मी दिलवा दो न जलेबी। लाल-लाल, गोल गोल। गुड़ वाली जलेबी ले लो मम्मी। जलेबी का आनंद लिया गया। पत्नी ने भी श्रृंगार की दुकान देख ली थी। वह श्रृंगार का सारा सामान खरीद ली। सब बच्चों ने अपने अपने हिसाब से सामान खरीद लिये। हमने अपने लिए एक सिगरेट का पैकेट खरीद लिया। 

सड़क की पटरियों पर दुकान सजी हुई हैं। तरह तरह के सामान बेंचें जा रहे हैं। खूब भीड़ है। मेले में जमकर खरीदारी हो रही है। खूबसूरत लड़कियां औरतों से मेले की रौनक शाम होते होते मजेदार हो गया। रंगीन माहौल। लाइटें जल गयीं हैं। खूबसूरत रौनक। हर कोई मेले का आनंद ले रहा है। दादा दादी सब दिखाई दिए। सब के लिए खुशी लाया था। जगह जगह नृत्य हो रहे थे। तरह तरह के खेल खिलौने। सब लोगों ने खरीददारी की। रात भर मेला चला। जी भर मेला देखा गया। जी भर खर्च किया गया। इलाहाबाद के माघ मेले में।

 


बेटियाॅं!- निमिषा सिंघल

 

बेटियाॅं!

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गाय समझ दान दे दी जाती हैं,

गाय की तरह किसी खूॅंटे से बाॅंध दी जाती है।

दान देकर पराया मान लिया जाता है,

उनका अस्तित्व

नकार दिया जाता है।

उनका कमरा उनका स्थान अब उनका नहीं रहता,

छीन लिया जाता है।

रोती बिटिया के साथ रोकर

विदा कर दिया जाता है।

नए घर में अनजान लोगों और

नयी परिस्थितियों के बीच

मान सम्मान का पल्लू सॅंभालती,

कहीं किसी को बुरा न लग जाए, 

पहले की तरह मुखर नहीं रह पाती।

हर कदम फूंक-फूंक कर आगे बढ़ाती फिर भी कमियों का पर्याय बन जाती है।

जहाॅं 

अब तक हर कदम उत्साह जनक बातों से घर के लोगों के प्रोत्साहन से उसे आगे बढ़ाता गया वही निराशाजनक बातों और आलोचनाओं सें घेर 

परंपराऐं रीति रिवाज

 थोप दिए जाते हैं।

संस्कारों के नाम पर

पॅंख काट दिए जाते हैं।

उड़ना मना है उन्हें।

मंगलवार, 16 जनवरी 2024

मोकों कहां ढूंढे बंदे, मैं तो तेरे पास में -राजेन्द्र कसवा साहित्यकार 

 

मोकों कहां ढूंढे बंदे, मैं तो तेरे पास में

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सातवीं-आठवीं कक्षा में ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन के प्रसिद्ध लेख धर्म की क्षय,जात-पांत की क्षय और ईश्वर की क्षय पढ़ चुका था। यशपाल के साहित्य में भी धर्म और ईश्वर पर खूब कटाक्ष किया गया है। भगतसिंह का प्रसिद्ध लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' भी उसी दौरान पढ़ा।

आज १२ जनवरी को ही स्वामी विवेकानंद के अनेक उद्धरण सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। उनमें से एक प्रस्तुत कर रहा हूं--मैं ऐसे भगवान में विश्वास नहीं करता जो जिन्दा रहते हुए तो मुझे रोटी नहीं दे सकता लेकिन मरने के बाद स्वर्ग देगा।

मैंने अपने एक संस्मरण में दशरथ पुत्र राम को भगवान मानने से इंकार किया था। विवेकानंद तो भगवान के अस्तित्व को ही नकार रहे हैं।

ईश्वर के बारे में संक्षेप में कुछ चर्चा कर लेते हैं। हमारी सबसे प्राचीन सभ्यता वैदिक काल है। उसमे प्रकृति को ही ईश्वर माना गया है। जैसे सूर्य, प्रथ्वी,आकाश, वायु,जल, अग्नि आदि। जाहिर है इनके बिना जीवन ही संभव नहीं है। इनके लिए किसी मंदिर या मूर्ति की आवश्यकता भी नहीं थी।

मैंने अपने बचपन में बुजुर्गो को सुबह उठते ही धरती को नमन करते देखा है।उदय होते सूरज को हाथ जोड़ते देखा है। जिस माटी के चुल्हे पर रोटियां सेंकी जाती, उस चुल्हे पर हम बच्चे पैर रख देते तो डांट पड़ती थी।इसे पाप समझा जाता। अग्नि के पैर लगाना पाप था।कुएं या जोहड़ में नहाने की मनाही थी।जेठ-आसाढ में पहली बारिश होती और किसान खेत में हल जोतते तो वे प्रकृति से ही अरदास करते। इस प्रार्थना में अपने परिवार के साथ ही मेहमानों, संतों, भिखारियों, सभी जीवों के लिए अन्न देने की याचना की जाती। मैंने कभी भी किसी देवता या भगवान का नाम लेते नहीं सुना।उन दिनों घर के चुल्हे की आग का बुझना अपशकुन माना जाता।

वैदिक काल में इन्द्र को राजा माना जाता था। वर्षा गीत गाते हुए मैंने महिलाओं को सुना जिसमें भी इन्द्र का उल्लेख होता था। यह अलग बात है कि वैदिक काल के बाद पौराणिक काल में इन्द्र को देवताओं का राजा माना गया।साथ ही उसे लफंगा भी दिखाया गया।

बचपन में स्कूल में पढ़ते समय जन्माष्टमी की छुट्टी अवश्य होती थी लेकिन गांव में केसरिया जी की नोक दी जाती थी। दूसरे दिन नवमी को गोगाजी की धोक के लिए खीर और गुलगुले बनाए जाते। घरवालों को इस बात का आश्चर्य था कि केसरिया जी की छुट्टी होती है जबकि गोगाजी की नहीं होती।ये सब लोक देवता हैं।

इसी तरह रामनवमी की छुट्टी होती थी किन्तु गांव में इसे त्योहार के रूप में नहीं मनाया जाता। जिनकी कुलदेवी काली माता,राय माता या जीण माता होती,उनकी धोक नवमी को लगाई जाती।लोक देवता की धोक के लिए खीर-चूरमा या खीर लापसी बनाई जाती।

इसी तरह दशहरे की छुट्टी होती तो घरवालों को आश्चर्य होता कि यह कोई त्योहार नहीं है, फिर भी छुट्टी होती है।(क्रमशः)

इलाहाबाद साहित्य के महान नक्षत्र यश मालवीय -जयचन्द प्रजापति "जय" प्रयागराज


 

इलाहाबाद साहित्य के महान नक्षत्र यश मालवीय

 

बहुत ही सौम्य प्रकृति के कवि यश मालवीय हिंदी साहित्य के एक महान नक्षत्र तथा कालजयी कृति की तरह हैं जो हिंदी साहित्य की जगमगाते सितारे हैं। इलाहाबाद के प्रसिद्ध सिद्धहस्त कवि के रूप अपनी एक पहचान बनाई है। कानपुर में इनका जन्म हुआ था लेकिन इलाहाबाद में कर्मस्थली बना लिया और इलाहाबाद की साहित्यिक मिट्टी मिलते ही इनके अन्दर साहित्य के बीज अंकुरित होने लगे।

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री ली और इलाहाबाद में ही रोजी रोटी मिल गई और साहित्यिक भूमि होने के कारण अपनी कर्मस्थली बना ली। साहित्य में इनका मन खूब लगता था। खूब जमकर साहित्य पढ़ते थे। साहित्यिक गतिविधियों में भी जाने लगे। इस तरह से साहित्य के प्रति रुझान प्रगाढ़ होता गया। धीरे धीरे कलम आपकी सराहनीय रचना देने लगी। इनकी एक रचना...

 

आग जगाए रखिए

.......................

 

आग जगाए रखिए

दिन भर

आग जगाए रखिए

जैसे भी हो

इस सर्दी में

राग जगाए रखिए

 

हो विचार के लिये

मज़े का

मिट्टी-पानी मन में

चले नहीं अब

किसी तरह की

खींचातानी मन में

 

राग-रंग

त्यौहार वसंती

फाग जगाए रखिए

 

बड़े जतन से

जटिल ज़िन्दगी

कुछ ऐसे जी जाए

हरियाली की

परिभाषा को

बर्फ़ नहीं पी पाए

 

पाला मारे

मौसम में

बन-बाग जगाए रखिए

 

सम्वेदन की

साँसों को

कुछ और-और गहराएँ

सर्द हवा के साथ

आम के बौर

खुद चले आएँ

 

इसका-उसका

अपना सबका

भाग जगाए रखिए

 

धुंध धुआँ को

अँधियारे को

ऊँचे स्वर में डाँटें

किरन उगाएँ

छाए हुए

कठिन कुहरे को काटें

 

ठहरे हुए

समय में

भागमभाग जगाए रखिए।

 

इस तरह से कविता, दोहा, व्यंग्य ,नवगीत पर खूब लिखने लगे। सहज सरल स्वभाव के यश मालवीय जी प्रकृति प्रेमी हैं। प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण में माहिर हैं। प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण करने की तीव्र शक्ति वाला ही एक सुंदर नवगीत लिख सकता है। यह गुण हिंदी के नवगीतकार यश मालवीय की कलम की धार से मतिस्क से होकर कागज के पन्नो पर आ जाता है।सचमुच आपकी रचनाएं मन को आह्लादित तथा प्रफुल्लित कर देती है।

 

यश जी बहुत ही सरल सहज भाषा में लिखते हैं। जानी पहचानी सी।एकदम नयापन के साथ और नई ऊर्जा से एक नई शैली में इनका नवगीत सचमुच ह्रदय की गहराइयों को छू लेती है। एक अनंत दुनिया की सैर कराती हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन,प्रमुख रूप से नवगीत लेखन। कवि सम्मेलनों में भागीदारी के अतिरिक्त दूरदर्शन, आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से रचनाओं का प्रसारण, पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं छपती रहती हैं।

 

प्रमुख कृतियाँ : ‘कहो सदाशिव’, ‘उड़ान से पहले’, ‘एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में’, ‘बुद्ध मुसकुराए’,  रोशनी देती बीड़ियाँ’, ‘नींद काग़ज़ की तरह’, ‘समय लकड़हारा’, ‘वक़्त का मैं लिपिक’, ‘एक आग आदिम’, (नवगीत-संग्रह); ‘चिंगारी के बीज’ (दोहा-संग्रह); ‘इंटरनेट पर लड्डू’, ‘कृपया लाइन में आएँ’, ‘सर्वर डाउन है’ (व्यंग्य-संग्रह); ‘ताक धिनाधिन’, ‘रेनी डे’ (बालगीत-संग्रह); एक नाटक ‘मैं कठपुतली अलबेली’ भारत रंग महोत्सव, नई दिल्ली में मंचित और दो बार उ.प्र. हिन्दी संस्थान का ‘निराला सम्मान’, संस्थान का ही ‘सर्जना सम्मान’ व ‘उमाकांत मालवीय सम्मान आदि कई सम्मान भी मिले हैं।

 

          

                                 जयचन्द प्रजापति "जय'

                                        प्रयागराज

प्रो. पुष्पिता अवस्थी को "विश्व नागरी रत्न" का सम्मान ।


 

हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन की अध्यक्ष और हिंदी भाषा की प्रख्यात साहित्यकार , भाषाविद तथा स्वाधीन भारत की वैचारिक चिंतक प्रो. पुष्पिता अवस्थी को पराधीन भारत के समय देश की स्वतंत्रता निमित्त देवरिया में स्थापित १९१५ की नागरी प्रचारणी सभा द्वारा "विश्व नागरी सम्मान" से गांधी सभागार में सम्मानित किया गया। उनके २५ वर्षो के विदेश प्रवास के दौरान लिखी गई

७८ पुस्तको के संदर्भ के साथ उनके कृतित्व पर विद्वानों ने चर्चा की और कवियों ने अपनी कविताओं के पाठ द्वारा रचनात्मक अभिनंदन किया। प्रो  पुष्पिता अवस्थी की आउट लुक, नया ज्ञानोदय और वागर्थ जैसी पत्रिका ओ में प्रकाशित समीक्षा का उल्लेख करते हुए आलोचकों ने रचनात्मक

समीक्षा की।   इसी अवसर पर प्रो. पुस्पिता ने प्रचारिणी सभा के मंत्री डा.अनिल कुमार त्रिपाठीजी, संयुक्त मंत्री

डा. सौरभ श्रीवास्तव जी को चाचा चौधरी, गुलशन नंदा, और ओशो चर्चित पुस्तको के प्रकाशक डायमंड की ओर से प्रकाशित अपनी सात पुस्तको के

चार सेट भेंट किए । हिंदी साहित्य और भारत की मनीषा तथा  चिंतन परंपरा के प्रकाशन के लिए समर्पित  डायमंड के मालिक श्री नरेंद्र वर्मा जी को हार्दिक धन्यवाद देते हुए दो  दो प्रतियां पुस्तकालय केलिए अन्य शेष वहां के विद्वानों के लिए सभा को प्रदान की।

 प्रो. पुष्पिता  ने देव और देवरहा बाबा की भूमि को

नमन से पूर्व विश्व के बौद्ध  साधकों की तीर्थ स्थली कुशी नगर की परिक्रमा की। शयन की मुद्रा के गोतम  बुद्ध जी  की अर्चना की।संतरी रंग की चादर ओढ़कर गौतम  बुद्ध का अभिनंदन किया साथ ही दो बस में आए कोरिया के बौद्ध भक्तो से मुलाकात की।

 

देवरिया की धरती से उद्भूत

देवरिया देवी की पूजा की।

 बालाजी के दर्शन कर वहां के महंत गुरु जी से आशीष प्रसाद लिया।

कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि मेयर श्रीमती अलका सिंह जी ने काशी के जे.कृष्णमूर्ति शिक्षण संस्था  की अपनी शिक्षा का उल्लेख करते हुए उसी

संस्थान से शिक्षित प्रो. पुष्पिता जी को अपने गुरु के रूप में अभिनंदन किया

और विश्व नागरी रत्न प्रदान करने के अवसर पर उपस्थित होकर गोरवान्वित अनुभव किया।