रविवार, 4 फ़रवरी 2024

ममता- (कहानी) केदार शर्मा, ‘’निरीह’’


कहानी

ममता

केदार शर्मा, ‘’निरीह’’

 

उन दिनो मोटर वाहनों के साधन आज की अपेक्षा कम थे। मैं उन दिनों टौंक शहर से आठ किलोमीटर दूर एक गाँव में साईकिल से ही स्कूल  आता जाता था । लौटते समय सड़क किनारे सब्जी का टोकरा लिए नीम  के पेड़ के नीचे  बैठी किशोर वय की एक लड़की से रोज शाम के लिए सब्जी भी खरीदकर  ले जाया करता था । सड़क के पास ही उनका  खेत और कुआ था ,उसके पास ही एक झौंपड़ी थी जिसमें वह लड़की परिवार सहित रहती थी । खेतों में आस-पास बहुत सी  झौंपडिया थी । कभी  गुजरते वाहनों की आवाज तो कभी सब्जी के खरीदार इस सन्‍नाटे को भंग कर  चहल-पहल में बदल देते थे ।

सब्जी  खरीदते समय मोल-भाव की नौंक-झौंक रोज होती । ऐसे ही एक दिन मैने मेने नाराज होने का नाटक करते हुए कहा-‘आज के बाद तुमसे सब्जी  नहीं खरीदनी है। तुम हमेशा ज्यादा भाव बताती हौ ‘

‘’ जाओ  बाबूजी जाओ  ,शहर से सब्जी खरीदकर तो देखो ,अगर यहाँ से भाव कम निकले तो मेरा नाम बदल देना ‘’।‘वह हँसते हुए स्‍वाभाविक रूप से कह गयी ।

क्या नाम है तुम्हारा ? मैने बात का सिरा पकड़ा । ‘मेरा  नाम तो ममता है , क्‍यों? ‘

‘भाव कम निकले तो तुम्‍हारा नाम भी तो बदलना है’ । ‘क्या तुम पढ़ी-लिखी हो ममता ? ‘

‘ नहीं  बाबूजी , मुझे तो नाम लिखना भी नहीं  आता ‘।

‘अच्‍छा नाम लिखना तो मैं सिखा देता हूँ। तुम ध्‍यान से समझकर अभ्‍यास कर लेना। बहुत आसान है ।‘मैंने रेत पर उँग ली से रेखाएं खींचकर ममता को नाम लिखकर समझा दिया।                                                              ;              दूसरे  दिन मैं फिर स्कूल से लौटा तो सबसे पहले मैंने वही सवाल किया –‘क्या  तुमने नाम लिखने का अभ्‍यास किया  ?

मुस्‍कराते हुए उसने पास ही रेत पर उकेरे हुए अक्षरों की ओर इशारा किया । उसने कई जगह अपना   नाम लिख रखा था। मेरे सामने उसने  दुबारा लिखकर बता दिया । मैंने प्रस्ताव रखा –‘ ममता  अगर  तुम चाहो तो मैं रोज वापस लौटते समय तुम्हें  पढ़ना-लिखना सिखा सकता हूँ’ ‘ । मैंने एक  कॉपी और पेन उसे उसी समय दे दिया । अभ्‍यास के लिए  उसका नाम लिखकर नकल करने के लिए दे दिया ।

अगले दिन ममता के पास एक प्रोढ़ वय की स्त्री बैठी थी । मेरा अनुमान सही था , वह उसकी मां थी ।  परस्पर अभिवादन और परिचय के बाद उसकी मां ने बताया ‘,बाबूजी  बचपन में यह  स्कूल जाने की बहुत जिद करती थी । तब  हम लोग  उसी गॉंव में रहते  थे जहाँ आप  रोज पढ़ाने जाते हो । छोटे भाई-बहिन को संभालने ,घर का काम कराने और दो जून की रोटी कमाने के स्वार्थ के चलते हमने इसकी जिद का गला घोट दिया  था । ‘ एक बार फिर इसने जिद की है । अब आप इसका पढ़ाने के कितने पैसे लेंगे  ? ‘’

मैंने कहा माँजी एक ही शर्त है ,यह अगर सीखती  रहेगी तो मैं रोज आधा-एक घंटा स्कूल से वापस लौटते  समय यहीं पर बैठ कर  पढ़ा दिया करूंगा । लड़की  है ,पढ़-लिख  जाएगी तो यह धर्म-पुण्‍य  का काम ही होगा । एक लड़की पढ़ेगी तो सात पीढ़ी तरेगी। परन्तु मुझे लगा कि यह सीख नही पा रही है , तो मैं पढ़ाना बन्द कर दूँगा । ‘’ मैने कुछ और किताबें ममता को दे दी और अक्षर ज्ञान का सिनसिला  शुरू कर दिया।

साईकिल को एक ओर खड़ी करके मैं खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर बैठ कर ममता को पढ़ाने लगा ।  कभी काई ग्राहक आ जाता तो उतनी देर के लिए हमें रुकना पड़ता ।ममता में गजब की ग्रहण शक्ति थी । एक बार जो बता दिया जाता उसे दुबारा समझाने की जरूरत नहीं  पड़ती थी ।अभ्‍यास  के लिए जितना दिया जाता उससे ज्यादा वह करती थी । मात्रा वाले  शब्‍द सीखना अपेक्षाकृत उसे कठिन लगा ,पर अभ्‍यास हो जाने के बाद वह तेजी  से वाक्य दर वाक्य पढ़कर समझने लगी । शुरू के कुछ  दिन उसकी मां सामने  बेठी रही । पर आश्‍वस्त होने के बाद कि उसकी बेटी सीखने में रुचि ले रही  है, वह अपने रोजमर्रा  के काम में पास  ही खेत में जुटी रहती।बीच  में एक दो बार आ जाती और मेरे   विरोध के बावजूद कभी-  कभी  एक थैले में सब्जी भरकर साईकिल पर टाँग  देती ।

लगभग तीन महीने में ममता ने हिन्दी पढ़ना  सीख लिया था । जब भी मैं उसे कोई नई कहानी की किताब पढ़ने को देता ,दूसरे दिन ढेर सारे कठिन शब्द  वह कागज प‍र लिखकर मेरे सामने रख देती ।  शब्दों के सन्दर्भ सहित अर्थ समझाना मेरी रूचि का विषय था ।एक बार मैंने उसे धार्मिक पुस्‍तक  ‘’सुखसागर की कथाएँ’’ जो मेरे पास पड़ी थी लाकर दे , दी तो वह विस्मित भाव से हँसने लगी –हे भगवान !इतनी मोटी किताब ! बाद में उसे वह पुस्तक  बहुत रुचिकर लगी ।   सामान्य जोड़,बाकी,गुणा,भाग में  में तो उसने  आशातीत गति से निपुणता प्राप्‍त कर ली थी । कुल मिलाकर मेरे  प्रयास और उसकी उपलब्धि संतोषजनक थी ।

दिसम्बर का महीना चल रहा था। ठंड अपनी पकड़ को मजबूत करने लगी थी । सूर्य जल्दी ही अस्‍ताचल की ओर  जाने लगा था । हमारे सीखने सिखाने का समय भी बहुत  कम हो गया था। अगले महीने से ममता को अंग्रेजी सिखाने की योजना मैने  मन ही मन बना ली थी  । हमारा विद्यालय भी उच्‍च प्राथमिक से  माध्‍यमिक में क्रमोन्‍नत हो चुका था ।

एक दिन अचानक प्राथमिक सेट अप के सभी अध्‍यापकों का स्थानान्तरण और उनके स्‍थान पर माध्‍यमिक सेट-अप के स्टॉफ  के पदस्‍थापन का आदेश आ गया था । मेरा स्थानान्तरण भी तीस कि;मी; दूर किसी गाँव में हो चुका था ।

स्कूल जाते समय ममता की मां मिल गयी । मैने स्थानान्तरण की बात बताई और कहा –अब मै कल से नहीं आ सकूंगा। आप ममता को ये और किताबें  दे देना और उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करते  रहना ।

।वह बहुत उदास हो गई,बोली-‘’ मास्टर साहब इस जंगल में उसे कौन पढ़ाएगा ? भला हो आपका  जो उसे पढ़ना - लिखना सिखा दिया ।ज्योंही फुरसत मिलती है किताबों में खो जाती है।शाम को खाना खाने के बाद आस-पास के परिवार आ जाते है और उस मोटी सी किताब में से रोज कथाएँ सुनाती है । उसके  जीवन में एक तरह की नई  उमंग  आ गई है ।ससुराल में भी परिवार पढ़ा-लिखा नहीं है । पति भी अनपढ़ है । आगे राम करे सो काम है ।‘’

स्कूल में भी आज उदासी का माहौल  था। कुछ बालिकाएँ रोने लगी थीं । एक साथ  हम चार  अध्‍यापक  जा रहे थे ।

विदाई समारोह के बाद कार्यमुक्त होकर मैं वापस  घर के लिए रवाना  हो गया । सुबह से ही आकाश में बादल छाए हुए थे ।ठंडी हवा तीर की तरह चुभ रही थी ।मंथर  गति से साईकिल आगे बढ़ रही थी पर मन  में विचारों क बवंडर चल रहे  थे । ममता  को आगे पढ़ते रहने की प्रेरणा देने के लिए शब्‍दों का जाल बुनता जा  रहा था । पता ही नहीं चला कि कब मैं ममता के सामने जाकर खड़ा हो गया ।

ममता ‘’मैं जा रहा हूँ’’ मैंने  इतना ही कहा था कि उसकी आँखों से  टप टप आँसू गिरने लगे। मेरा भी गला रूंध गया था। मुँह से कोई शब्द निकलना मुश्किल था। भावनाओं के ज्वार को रोक पाने  की अक्षमता से आशंकित हो मैंने  साईकिल आगे बढ़़ा दी ।

समय पंख लगाकर उड़ता गया । ममता की स्मृति भी अतीत की धुंध में खो गयी थी।

कई वर्षों बाद संयोग से  एक दिन पास ही के एक कस्‍बे  में स्थित हमारे  गुरूजी के आश्रम में साधना-शिविर का  आयोजन  था । साधकों के लिए भोजन  व्यवस्‍था की  जिम्‍मेदारी मुझे दी गई  थी । अत: सुबह ही किसी को लेकर सब्जी –मंडी  में जाना  पड़ा ।एक बड़ी सी दुकान से मैंने सब्‍जी खरीदकर ऑटो  में रखवा दिया ।

भुगतान के लिए मेरा ध्‍यान  काउंटर पर गया । वहाँ ममता बैठी  थी ।दैखते ही पहचान गई ,बोली –सर , ‘’आप यहाँ  ! ‘’ ‘’हाँ ममता , यह संयोग ही है  जो मनुष्‍य को मनुष्‍य से मिला देता  है ।‘’मैंने विस्तार से  सारी  बात  बताई।

सर ,’’ इस दुकान के पीछे ही  मेरा ससुराल है । यह दुकान हमारी  ही है । पति पढ़े-लिखे नहीं है इसलिए हिसाब-किताब मैं ही संभालती हूँ ।आपने जो सिखाया था , उससे जीवन  में बहुत संम्बलन  मिला है । ‘’

‘’ लेकिन ममता,वह तो तुम्हारी सीखने की ललक और कुशाग्र बुद्धि का परिणाम था , अन्यथा  इसके बिना क्या सीखना संभव  होता  ?’’

‘’हाँ सर ,वह बोली – दीपक भी हो उसमें तेल भी भरा हो ,तेल से भीगी हुई बाती  भी हो , पर यदि उसे प्रज्‍ज्‍वलित  करने  वाली  चिनगारी न  हो तो क्या उजाला हो सकता है  ? सर,आश्रम में पधारे हुए  साधकों  के लिए आज  की सब्जी  मेरी  ओर  से’’ कहते हुए  दोनो हाथ जोड़कर ममता  ने  रूपए  वापस  दे  दिए ।


 

देवरानी-जेठानी- विजय राही

देवरानी-जेठानी

 बेजा लड़ती थी आपस में काट-कड़ाकड़

जब नयी-नयी आई थी दोनों देवरानी-जेठानी

 अपनी पर उतर जाती तो

बाप-दादा तक को बखेल देती

जब लड़ धापती पतियों के सामने दहाड़ मारकर रोती

 कभी-कभी भाई भी खमखमा जाते

लाठियाँ तन जाती

बीच-बचाव करना मुश्किल हो जाता

 कई दिनों तक मुँह मरोड़ती

टेसरे करती आपस में

भाई भी कई दिनों तक नहीं करते

एक-दूसरे से राम-राम

फिर बाल-बच्चे हुए तो कटुता घटी

सात घड़ी बच्चों के संग से थोड़ा हेत बढ़ा

जैसे-जैसे उम्र पकी

गोड़े टूट गए और हाथ छूट गए

दोनों बुढ़िया एक-दूसरे की लाठी बन गयी

 अब दोनों बुढ़िया

एक दूसरे को नहलाती चोटी गूँथती

जो भी होता बाँटकर खाती

एक बीमार हो जाये तो दूसरी की नींद उड़ जाती

 उनका प्रेम देखकर

दोनों बूढ़े भी खखार थूककर

कउ पर बैठने लगे हैं

साथ हुक्का भरते हैं

ठहाका लगाते हैं कोई पुरानी बात याद कर

 अन्दर चूल्हे पर बैठी

दोनों बुढ़िया भी सुल्फी धरती हुई

एक-दूसरे के कान में कुछ कहती हैं

और हँसती हैं हरहरार

आत्म शक्ति-डॉ.पुष्पिता अवस्थी - प्रोफेसर,लेखिका और कवयित्री नीदरलैंड


                                       डॉ.पुष्पिता अवस्थी                                                                                                                                             प्रोफेसर,लेखिका और कवयित्री                                                                                                                            नीदरलैंड

आत्म शक्ति

 

आंखों की कोरो के

तटबंध धसके है -

शब्द स्पर्श से.

आत्मा के भीतर

अभिषापित अहिल्या

अवतरित हुई है

जिसके आंसुओ को

जिया है।

मेरी आंखों ने

अहिल्या की आंखे बनकर।

 

आंखे साक्षी है

आत्मा की मुक्तावस्था

के सत्य की

उनके पास

आंसू के हस्ताक्षर हैं।

जो आत्मा की आंखो से

बहे हैं -

अविश्वसीय दुनिया के बीच

विश्वास के अपरिहार्य

क्षणों में

सैकड़ों दीवाने हैं आज भी सौलत की शायरी के - एम.असलम. टोंक


 सैकड़ों दीवाने हैं आज भी सौलत की शायरी के

------------------

एम.असलम. टोंक

------------------

टोंक के उस्ताद शायरों में हजरते सौलत का नाम आज भी बड़े अदब से लिया जाता है। वो ग़ज़ल के शायर थे, लेकिन उन्होंने शायरी की हर विधा में लिखा। ज़िंदगी में उनका कोई दीवान प्रकाशित नहीं हो सका। लेकिन उनकी शायरी के दीवाने जमाने में बहुत हैं। वो उर्दू, फारसी एवं अरबी के जानकार होने के साथ ही एक ऐसे शायर थे, जिनकी महफिल में मौजूदगी ही महफिल की कामयाबी का बाइस हुआ करती थी। उन्होंने हज़ारों शेर कहे, सैंकड़ों ग़ज़लें लिखी। लेकिन उनको अपनी हमदर्दी व काबिलियत के सिले में दुश्वारियों के सिवाए कुछ मिलता नज़र नहीं आया। 

 

"बाम व दर मतला ए अनवार नज़र आते हैं,

उनके आने के से आसार नज़र आते हैं। '

 

हजरते सौलत का नाम सैयद महमूदुल हसन सौलत टोंकी था। जो अरब में जनवरी 1898 में पैदा हुए। बचपन में ही उनके वालेदेन का इंतकाल हो गया था। बताया जाता है कि साहबजादा इकरामुद्दीन खां की वालिदा उनको हज पर जाने के दौरान वहां से कम उम्र में ही टोंक ले आई थी। 11 साल की उम्र में वो शायरी करने लगे।

 

"बहुत से रंज उठाए है ज़िंदगी के लिए,

हजार बार में रोया हूं इक हंसी के लिए।

ये बात क्या है कि तारीक है मेरी महफिल,

चराग़ लाख जलाए हैं राेशनी के लिए।'

 

टोंक के शायरों पर लिखी स्व. हनुमान सिंह की पुस्तक अंजुमन में लिखा है कि "जब भी टोंक में उर्दू शेरो शायरी का जिक्र आएगा हजरते सौलत का नाम अपने आप जुबान से फिसल जाएगा, एक जमाना था जब उर्दू शेरों शायरी की कोई भी महफिल तब तक मुकम्मल नहीं मानी जाती थी, जब तक कि हजरत सौलत तशरीफ नहीं ले आते थे।

 

"ये कैसी दिल रुबाई है निगाहें नाज़ कातिल में,

के पैदा कत्ल होने की तमन्ना हो गई दिल में'

 

सौलत साहब के निधन के बाद साहबजाद शौकत अली खां ने उनकी याद में ऑल इंडिया मुशायरा टोंक में करवाया तथा अपने इंस्ट्यूशन से एक जनरल उनको केंद्रीत करते हुए प्रकाशित भी करवाया था। दिल्ली के एक रिसाले शाने हिंद ने भी उनके कलाम को प्रकाशित किया।

 

"किसी करवट तो चैन आए किसी पहलू तो कल आए,

इलाही कोई सूरत तो तसल्ली की निकल आए। '

 

हजरते सौलत 1968 में दुनिया से रूखसत हो गए। लेकिन उनकी शायरी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। उनकी शायरी की तारीफ कई नामवर शायर करते नहीं थकते हैं। उनके शार्गिदों की भी एक लंबी फेहरिस्त रही।

 

"यह किसी की याद ने ली चुटकियां दिल में मेरे "सौलत',

यह इक दम बैठे बैठे क्यो मेरे आंसू निकल आए।

बुधवार, 31 जनवरी 2024

रचना और आलोचना की अन्तर्सम्बद्धता- अजित कुमार राय


 रचना और आलोचना की अन्तर्सम्बद्धता

=========================

 

रचना और आलोचना के द्वन्द्व को उसकी सामासिकता में पहचानना एक कठिन कार्य है। दोनों की भूमिकाओं की अदला-बदली भी सर्वज्ञात है। रचना भी तो मूलतः जीवन की आलोचना ही है। कविता यदि जीवन की पुनर्रचना है तो आलोचना कविता की पुनर्रचना। इसका यह अर्थ है कि आलोचना रचना पर आश्रित होती है और आलोचक रचना का प्रथम पाठक और व्याख्याता है। किन्तु इसका यह आशय कतई नहीं कि आलोचना दोयम दर्जे की विधा है। वस्तुतः आलोचना रचना का पुनर्पाठ है। वह कवि के देखने को समग्रता में देखना है। इस प्रकार विमर्श को वह प्रतिसम्पूर्ण बनाती है। रचना यदि जीवन की जटिलताओं को संश्लिष्ट रूप में प्रस्तुत करती है तो आलोचना रचना के व्याख्या-विश्लेषण में प्रवृत्त होती है। उसका दायित्व रचना के मूल्यांकन और स्तरीकरण का भी है। ईमानदार आलोचना कवि को प्रमाण-पत्र देती है और पर्यावरण को स्वयंभू महाकवियों, कथाकारों एवं निबंधकारों से बचाती भी है। राजनैतिक आलोचना पत्रकार बनाती है और आलोचना की राजनीति शिविरबन्दी की ओर ले जाती है। अतिवादी आलोचना स्वस्थ रचनाशीलता में भी कूड़ा देखने लगती है, जबकि अज्ञेय की अंतर्दृष्टि कूड़े में भी सौन्दर्य देख लेती है। विचारधाराएँ रचना को समझने की दृष्टि प्रदान करती हैं, किन्तु ‘प्रतिबद्धता’ रचना के सम्यक् आकलन में बाधक भी बनती है। कालिदास कहते हैं-  ‘‘निरंकुशा हि  कवयः।’’ श्रेष्ठ कवि हमेशा किसी भी चैखटे से बाहर पड़ता है। वह जिंदगी का निर्वसन साक्षात्कार करता है, किसी फ्रेम में नहीं। वह नंगे तलवों खुरदुरी जमीन पर चलता है, उसे किसी पदत्राण की जरूरत नहीं।

 रचना सत्य को सम्पादित करती है, विकृत नहीं। वह चाटमार्का यथार्थ के बजाय, रचनात्मक यथार्थ का संग्राहक है। वह एक कला है जो जीवन को सम्बोधित है। वह सम्वेदनात्मक सत्याग्रह तो है ही, कलात्मक अभिनिवेश भी है। उसमंे कथ्य और शिल्प का संश्लेष वाक्षित है। मुक्तिबोध एक खांटी प्रगतिशील कवि हैं किन्तु उन्होंने कलावादियों की फैंटेसी अपनायी और उनका स्वप्न सच से भी अधिक क्रूर हो गया। डाॅ0 प्रभाकर श्रोत्रिय कहते हैं- “मुक्तिबोध इस भयानक संसार की गुंजलक में फँसी बेचैन आत्मा का एक घनघोर आख्यानक रचते हैं।” यह वही मुक्तिबोध हैं जो छायावाद के प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद को विचारधारा के आधार पर खारिज नहीं करते, बल्कि ‘कामायनी’ का पुनर्मूल्यांकन करते हैं। विरोधी विचार सरणियों से अंतः-क्रिया और संवाद का यह विरल उदाहरण है। विपरीत विचार-दृष्टियों में रचनात्मक सामंजस्य ही तो कुबेरनाथ राय की भारतीय दृष्टि है। यह नित्यानंद तिवारी का ‘सर्वसंश्लेषणवाद’ नहीं। तुलसी की व्यापक समन्वय दृष्टि विभिन्न दर्शनों, संप्रदायों एवं जीवन शैलियों में एक सामंजस्य की तलाश है। तुलसी एक महान सर्जक ही नहीं, श्रेष्ठ आलोचक भी हैं। आठवें ‘लव-कुश’ कांड का ‘रामचरितमानस’ में निषेध करके प्रकारान्तर से अपने आराध्य के सीता-त्याग और शम्बूक-वध प्रसंग से अपनी प्रच्छन्न असहमति भी उन्होंने जाहिर कर दी है। साथ ही अपने महानायक के हाथों एक ब्राह्मण खलनायक का वध कराकर ‘ब्राह्मणवाद’ का अतिक्रमण भी करते हैं।

 हर सर्जक के भीतर एक आलोचक छिपा रहता है और प्रायः आलोचक का प्रस्थान-बिन्दु कविता ही होती है। चाहे वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हों या नामवर सिंह, डाॅ0 विवेकीराय हों या कुबेर नाथ राय। ज्ञानात्मक संवेदन या संवेदनात्मक समझ के बिना तो आलोचना लिखी ही नहीं जा सकती। मैं स्वयं नई कविता को समझने के लिए आलोचना के द्वार गया और कवि से आलोचक बन बैठा। विजयदेव नारायण साही और नलिन विलोचन शर्मा ही क्यों, कुँवर नारायण, अशोक वाजपेई से लेकर ज्ञानेन्द्रपति, राजेश जोशी और अष्टभुजा शुक्ल तक एक ही साथ कवि भी हैं और आलोचक भी। अनामिका और पंकज चतुर्वेदी का गद्य भी पढ़ने के लिए आमंत्रित करता है। नरेश मेहता और निर्मल वर्मा के अलावा, नई कहानी के पुरोधा राजेन्द्र यादव भी एक ऊर्जावान विमर्शकार हैं। ‘हंस’ के संपादकीय लेखों से मुखर असहमति हो सकती है, किन्तु उसकी आलोचना-भाषा के सौन्दर्य से कौन इन्कार कर सकता है ?  डाॅ0 नामवर सिंह राजेन्द्र यादव की भाषा में ‘उग्रता’ और सांस्कृति दृष्टि की दरिद्रता देखते हैं पर वही उसकी शक्ति भी है।

 आलोचना को रचना की अर्थच्छाया से बिम्ब और विमर्श तक ले जाने वाले अन्वेषी आलोचकों में आज अजय तिवारी, विजय कुमार, जयप्रकाश, ओम निश्चल, रमेश चन्द्र शाह, अर्चना वर्मा, अभय दुबे, अपूर्वानन्द, पंकज पराशर और रजनी गुप्त का नाम लिया जा सकता है। विनोद शाही की भाषा की दुरूहता और अमूर्तन के बरक्स डाॅ0 शंभुनाथ और विजय बहादुर सिंह की भाषा में प्रासादिकता के दर्शन होते हैं। ‘सहारा-समय’ के आरंभिक दौर में जब डाॅ0 नामवर सिंह और मंगलेश डबराल उसके सलाहकार सम्पादक हुआ करते थे, उस साप्ताहिक पत्र के सम्पादकीय लेखों का मैं कायल था। भाषा को डायल्यूट कर कैसे उसकी पोटेन्शी बढ़ाई जाए कि भाषा सम्पे्रष्य भी हो और उसकी स्तरीयता भी सुरक्षित रह सके, इस दृष्टि से वह एक मानक भाषा थी। ‘इंडिया टुडे’ की कुछ पुस्तक समीक्षाओं में भी उसी भाषा का आविष्कार लक्षित होता था, जब अशोक जी उसके साहित्य सम्पादक थे। कुछ पुस्तकों या काव्य-संग्रहों की भूमिकाओं में भी आस्वाद्य मंत्र-भाषा के निदर्शन यदा-कदा प्राप्त हो जाते हैं। आज यदि उसी मानक गुणवत्ता को कविता में शिफ्ट किया जा सके तो हम एक आदर्श समकालीन काव्य-भाषा का निर्माण कर सकते हैं। जैसे गोस्वामी तुलसीदास का रामचरित मानस क्लास और मास की कविता के बीच एक सेतुबंध है। वह एक ही साथ जनकाव्य भी है और सुजन साहित्य भी। लोकसंग्रह के द्वारा ही हम मंचीय कविता और साहित्यिक कविता के बीच की खाईं को पाट सकते हैं। आज की गद्यब्राण्ड सिन्थेटिक कविताओं और फूहड़ मंचीय भँडैती के बीचोंबीच सुनहरी रेखा खींच देने वाले नवगीत को हमने लम्बे समय तक उपेक्षित रखा। इसके लिए वर्तमान आलोचना जिम्मेदार है। नामवर सिंह को नवगीत का सौन्दर्य बहुत देर में दिखाई पड़ा। दरअसल वहाँ सौन्दर्य ही कुरूपता है अथवा कुरूपता का सौन्दर्यशास्त्र रचा जाना ही अभिप्रेत है। जीवन में सत् भी है और असत् भी। उसका समग्रता में स्वीकार ही साहित्य का पाथेय है, किन्तु विचारधारा के वर्चस्व ने जहाँ धूमिल जैसा सशक्त कवि दिया वहीं नवगीत की कलाचेतना को कुंठित भी किया। नई कविता और नवगीत एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। कुछ लोग तो इतिहास और कविता की मृत्यु की घोषणाएँ सन् 1990 के आस पास ही कर चुके थे, ताकि वे खुद अमर हो जाएँ। सुधीश पचैरी जी! ऐसी आत्मघाती आलोचना रचना का कितना कल्याण कर सकती है! जिस दिन हम गुनगुनाना बन्द कर देंगे उस दिन कविता अवश्य मर जाएगी। किन्तु हम तो रोते भी हैं तो गीतों में रोते हैं। गीत में समय का प्रभाव प्रच्छन्न या अन्तव्र्याप्त रहता है। वह जीवन की जटिलताओं या सम्पूर्ण समय को समेटने का दावा नहीं करता। गीत गेहूँ नहीं, जिसे हार्वेस्टर से काटा जाए। वह तो गुलाब है जिसमें खेत-खलिहान की महक मिली हुई है। यहीं याद आते हैं विद्यानिवास मिश्र और उनकी संक्रामक उत्सव-चेतना। जहाँ एक खेत की फसल पकती है तो देखादेखी दूसरे खेत की फसल भी पकने लगती है। परंपरा की यह परिपक्व चेतना ही उनके ललित निबन्धों में सुनहरा आकार ग्रहण करती है। दलित आँखों की लालिमा का संक्रमण बच्ची को बीमार न बना दे इसलिए वे ललित की सृष्टि करते रहे। किन्तु जिन्हें लालित्य से ही चिढ़ है उनका इलाज कैसे किया जाए ? जब दुष्यन्त कुमार कहते हैं-

 तू किसी रेल सी गुजरती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।

तो उसमें समय का कम्पन भी है और कविता का रोमांच भी। पे्रम के अनुलोम-विलोम को यूँ शब्दों में उतारना एक प्राणायामी साधना है। किन्तु जब धूमिल कहते हैं-

 लोहे का स्वाद लुहार से मत पूछो

 उस घोड़े से पूछो, जिसके मुँह में लगाम है।

तो शोषक-शोषित सम्बन्धों की व्याख्या अपने आप हो जाती है। आज के राजनैतिक विद्रूप को आणविक-भाषा में व्यक्त करते हुए वे कहते हैं-

 ये जिसकी पीठ ठोंकते हैं

 उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है।

सूत्र शैली में सभ्यता-समीक्षा का यह प्रतिमान है। धूमिल पर अक्सर सपाट बयानी का आरोप लगाया जाता है। परन्तु धूमिल और ज्ञानेन्द्रपति की कविताएँ ‘आभिधा उत्तम काव्य है’ को सत्यापित करती हैं। ज्ञानेन्द्र की तो सारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही मानो आँख बन गयी हैं। एक आदिवासी गाँव से गुजरती बस में बैठे लोगों की समवेत् दृष्टि-रेख का गत्यात्मक बिम्ब चाक्षुष प्रतीति कराता हुआ कवि की संवेदनशील दृष्टि का प्रमाण प्रस्तुत करता है-

 ‘‘अलसाती सी उठ रही

 स्त्री की आँखों से

 मिलती जाती आँखों की एक कतार।’’

सत्य से आँखें मिलाना आसान नहीं। भाव-समाधि या आ-लोचन का यह समेकित उदाहरण है। ‘शब्द-स्वैराचार’ शीर्षक अपनी कविता में मैंने आलोचकों की आलोचना से रचना को जन्म दिया था-

 आचरण की भूमि पर, उतरना मुझे आता नहीं

 अक्षरों के पंख पर, अतः उड़ जाने दो।

 आचरण की बात पूछनी ही है तो पूछ लेना,

 प्रवचन का रेट पहले तय तो हो जाने दो।

कवियों, नेताओं और प्रवचन कर्ताओं से सर्जनात्मक आचरण की दीक्षा की अपेक्षा ही इस रचना की अन्तर्वस्तु है। आज के बाजारवादी समय में लोभ और लाभ के निषेध का प्रवचन भी लाभ या लिफाफे के लिए ही होता है। कविता भी बिकाऊ माल है और द्राक्षासव में डूब कर ही लिखी जाती है मदिर कविता। समय और समाज की आलोचना करने वाला खुद अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाता। राजेन्द्र यादव, शिवप्रसाद सिंह और विजय बहादुर सिंह से मेरा विसंवाद एक तल्ख अनुभव है। आलोचक डाॅ0 शम्भुनाथ एक रचनात्मक प्रस्ताव रखते हैं- ‘‘सवाल है कि हम वैश्वीकरण, बाजारवाद और संचार क्रान्ति को भारतीय लोकतंत्र के ढांचे में स्वीकार करना चाहते हैं या भारतीय जनतंत्र को वैश्वीकरण, उदारीकरण और सूचना क्रान्ति के ढांचे में विसर्जित कर देना चाहते हैं।’’ इस प्रकार आलोचना आज रचना का दायित्व निभा रही है और आर्थिक साम्राज्यवाद के कूट मंतव्यों, निहितार्थों और दुरभिसंधियों का कुशलता से भेदन कर रही है। वैसे आज समय और समाज की छवियों का सर्वश्रेष्ठ निदर्शन कहानी और उपन्यास में प्राप्त होता है। सभ्यता समीक्षा का महत्वपूर्ण साधन निबन्ध भी है जहाँ आलोचना की ही तरह विचारों का विन्यास प्रत्यक्ष तौर पर लक्षित होता है किन्तु कविता की पद्धति किंचित तिर्यक् है।

 जयप्रकाश ठीक ही कहते हैं- ‘‘यह नृ-केन्द्रिक संसार के उत्कर्ष का समय है और विडम्बना है कि इस समय को रचने वाली शक्तियाँ नृ-घातक रूप धर चुकी हैं। अवसाद इस समय का स्थायी भाव मालूम होता है। ... यथार्थ की खरांेच से बचे किसी अक्षत-अनाहत स्वैर-लोक में जा छिपना अब न तो संभव है, न काम्य। वस्तुतः पूँजी, तकनीकी और बाजार ने इधर जिस नए यथार्थ का उत्पादन शुरू किया है, उसकी पहुँच न केवल समाज की भीतरी गहराइयों तक है, बल्कि उसने व्यक्ति के मनोलोक में भी सेंध लगा ली है।’’

 आज के समय के अधिनायकवादी चरित्र की चर्चा करते हुए विजय कुमार कहते हैं- ‘‘आज अत्याचार का संस्थानीकरण हो चुका है और निर्धारित फ्रेम में चीजों के अर्थों को निरपेक्ष, निर्बन्ध और समतल दिखाने की पुरजोर कोशिशें हैं। इसके विपरीत कलाएँ हमेशा सापेक्ष, गतिशील, आत्मिक और परस्पर सम्बद्ध सचों की तरफ बढ़ना चाहती हैं। ... मौजूदा समय में यह दुनिया जो कि अब पहले के समयों की तरह सरल रैखिक और ऐकान्तिक रूप से तर्कपूर्ण नहीं रही, जहाँ मनुष्य के किसी बड़े स्वप्न या आदर्श को लगातार झुठलाया जा रहा है और परस्पर विरोधी हित लड़ने के बजाय पिघलकर एक ‘कोलाज’ तैयार कर दे रहे हैं, वहाँ संस्थानों और शक्ति-संरचनाओं के सम्मुख मनुष्य के अंतर्जगत के दबे-ढँके कोनों, अन्तरालों, अनिश्चयों और संशयों की भूमिका क्या पूरी तरह समाप्त हो चुकी है ?’’

 कला की दुनिया में इस प्रश्न का उत्तर ढूँढते हुए वे अन्यत्र कहते हैं- ‘‘सत्ता और शक्ति-संरचनाओं को किन्हीं संस्थानिक औपचारिकताओं में न देखकर रोजमर्रा के जीवन, कर्म और आचरण पर पड़ती परछाइयों में ही समझा जा सकता है। बेचेहरा समझ लिए गए लोगों के चेहरे, इस कविता में दिखने लगते हैं।’’

 आज की कविता वस्तुगत सच्चाई को विरूपित नहीं करती, लेकिन बनी हुई अवधारणाओं के बाहर निकल जाती है। ये कविताएँ मनुष्य को एक आर्गेनिक प्राणी के रूप में खोजना चाहती हैं। एडोर्नो ठीक ही कहते हैं- ‘‘हमारे इस दौर में कविता किसी नई अवधारणा को बनाने का काम नहीं करती, बल्कि वह ‘वास्तव’ और ‘विचार’ के ठीक बीच बैठे हुए एक बेहद बुनियादी विरोधाभास को उठाती है, जिसे बाहरी ताकतें ढँक देने पर आमादा हैं।’’ वह ‘भाषा का स्वप्न’ नहीं देखतीं, भाषा में स्वप्न को अपदस्थ होते देखती है।

 आज तकनीक-आधारित माध्यम भी यथार्थ की प्रसंस्करणात्मक या सत्ता-सम्मत छवियों के उत्पादन में निरत् हैं, कविता उसकी प्रामाणिकता की परख का एकमात्र स्रोत है। इसलिए आज अमूर्त काव्य-सौन्दर्य के बजाय मूर्त जीवन-संघर्ष का पाठ रचा जाना चाहिए। साथ ही अपनी ऐन्द्रिक संरचना में सभ्यता के वृहत्तर संदर्भों की पड़ताल करते हुए उसमें मनुष्य की नियति के प्रश्नों को उठाने का यत्न भी होना चाहिए। जैव-सांस्कृतिक विविधता के संहार को टोकना, बल्कि रोकना बहुत जरूरी है। बाजार की सर्वसत्तात्मकता और राजनीति की हिंस्र महत्वाकांक्षा के साथ ही बर्बरता और वर्चस्व का प्रतिरोध एवं अनावरण भी जरूरी है। जयप्रकाश कहते हैं- ‘‘बाजार ने समाज को एक तरह से विस्थापित कर दिया है और वह समाज का पर्याय बन बैठा है।’’ आज विप्लव और त्रासदी भी प्रदर्शन की वस्तु बन गयी है। मीडिया पीड़ा को अनुरंजक बना कर परोसता है रिपोर्ताज। हमारे समय में क्रूरताओं के यह नए आयाम हैं इसलिए आज अतीत नहीं, वर्तमान के खंडहरों से उठायी जानी चाहिए कविता, भाषा में किसी मूलगामी तनाव की उपस्थिति के साथ। यह दुःस्वप्न की फैंटेसी की सीमाएँ पार कर गया समाज है जहाँ नई इमारतों की चमक-दमक में उजड़ने की दास्तान छिपी है। श्रीकृष्ण तिवारी इसे प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति देते हुए कहते हैं-

 घर आँगन जलता जंगल है, दरवाजे साँपों का पहरा।

 बहती रोशनियों में लगता अब भी कहीं अँधेरा ठहरा।

इसलिए रचनाकर्म की बुनावट पर गम्भीर विमर्श करते हुए विजय कुमार कहते हैं- ‘‘आज दाँव पर लगे हुए मुद्दे ज्यादा जटिल हैं और नई आकस्मिकताओं की माँग करते हैं। हम अपने वरिष्ठ कवियों को अनदेखा नहीं कर सकते पर लगातार उनसे लड़ते हुए ही अपनी कोई राह खोज सकते हैं।’’

 इस प्रकार आलोचना आज रचना की अनुगामी नहीं, बल्कि उसके आगे-आगे चल रही वह आलोक-मंजूषा है जो क्रान्तिदर्शी कवि को क्रान्तिकारी भूमिका में देखना चाहती है। यह भी एक आश्चर्यजनक विडम्बना है कि जिस आलोचना की भाषा आज इतनी कलात्मक और सौष्ठवपूर्ण है वह कविता की मुख्यधारा पर रूपवादी होने का आरोप मढ़ती है। उसके आवर्जक स्थापत्य को प्रश्नांकित करती है। कविता पाठकों की अदालत में दायर एक जनहित याचिका है और श्रेष्ठ क्लासिक काव्यों के आधार पर ही आलोचना के मानक तय किए जाते हैं। किन्तु समय की क्षिप्र गतिक प्रगति और परिवर्तनों को उतनी तेजी से आत्मसात न कर पाने के कारण कविता आज पिछड़ गयी है और प्रतिबद्ध कवि आलोचकों को अनुशास्ता मान कर उनके हिसाब से कविताएँ लिखने लगे हैं क्योंकि जनवादी कविता को कितने ‘जन’ पढ़ते हैं, यह सभी जानते हैं। आम आदमी को सम्बोधित कविताएँ खास आलोचक ही पढ़ते हैं। ‘कविता के अर्थात्’ ने कविता को आच्छादित कर लिया है किन्तु आलोचना रचना के जनतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिश्रुत है। यह अलग बात है कि आज की अधिकांश आलोचना पुस्तक समीक्षाओं में रिड्यूस हो गयी है। किन्तु पंकज चतुर्वेदी इसके उलट राय रखते हैं। वे यह मानते हैं- ‘‘यह समकालीन रचनाशीलता की भयावह और अप्रत्याशित उपेक्षा का दौर है। आज के अधिकांश आलोचक पश्चिमी आलोचकों के विचारों का हिन्दी में उल्था कर रहे हैं। जबकि आलोचना से यह अपेक्षित है कि वह दुनिया की ज्ञानात्मक उपलब्धियों को दर्शन और चेतना के स्तर पर आत्मसात करके समकालीन यथार्थ और रचनाशीलता के विश्लेषण में उस दृष्टि का इस्तेमाल करे।’’ वे आगे कहते हैं- ‘‘माक्र्सवाद के लिए यह अपने को आलोच्य मानते हुए आत्मविकास करने और अन्य विचार-सरणियों से विमुख होकर नहीं, उनसे अन्तक्र्रिया और संवाद करते हुए अपनी वास्तविकता को पहचानने और हासिल करने का अवसर है।’’ आज की कविताओं के समरूपीकरण और मानकीकरण को मंगलेश डबराल एक नई उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के रूप में देखते हैं। विजय कुमार भी इस रचनात्मक जड़ता के लिए कहीं न कहीं आज के आलोचना परिदृश्य को एक हद तक दोषी मानते हैं- ‘‘कलाकर्म तो हमेशा ही बने-बनाए रास्तों से भटकता रहा है और असफलताओं के खतरे भी उठाता रहा है लेकिन एक बने-बनाए पैटर्न को दुहराना विमर्श की नयी संभावनाओं पर पटाक्षेप करना है।’’

 आज सैद्धान्तिक आलोचनाएँ तो बहुत अच्छी लिखी जा रही हैं किन्तु व्यावहारिक आलोचना में हम वर्गवादी राग-द्वेष से मुक्त नहीं हो पाते और शिविरबन्दी के शिकार हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में बहुत पहले एक इंटरव्यू प्रकाशित हुआ था जिसमें कमलेश्वर और नामवर सिंह आमने-सामने दिखाए गए हैं। कमलेश्वर जहाँ यह मानते हैं कि आज आलोचना का प्रायमरी पैमाना भी नहीं है वहीं नामवर सिंह कहते हैं कि खूब अच्छी आलोचनाएँ लिखी जा रही हैं। ज्यां पाल सात्र्र ने कभी नोबेल पुरस्कार ठुकरा दिया था और अभी कुछ वर्षों पूर्व ही बंगाल के नीलकमल ने साहित्य अकादमी का पुरस्कार ठुकरा दिया था। इसके पीछे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की वही दृष्टि काम कर रही थी कि आलोचक और संस्थाएँ पुरस्कारों के संदर्भ में निष्पक्ष निर्णय नहीं ले पातीं।

 कविता के क्षरण के लिए उसके अपने रूप और गठन से अधिक आज का सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश जिम्मेदार है। आलोचना का दायित्व रचना के गुणों के संदर्भ में दोषों को भी परखना है साथ ही अपने दोषों पर भी दृष्टिपात करते हुए अपने भीतर सर्जनात्मक आचरण का विकास सर्जक और आलोचक दोनों के लिए ही अपरिहार्य है। हम जब अपने कैमरे से दूसरों का पोज ले रहे होते हैं तो किसी दूसरे के कैमरे में फोटो खींचते हुए अपना पोज दे भी रहे होते हैं। योगेन्द्र यादव से लेकर रवीश कुमार तक बहुत अच्छे और साहसी राजनैतिक आलोचकों की एक स्वस्थ परंपरा रही है किन्तु उन्हें भी अपने ब्लाइंड-स्पाॅट को देखने की अंतर्दृष्टि विकसित करनी होगी और अपने विचारों से तादात्म्य तोड़ कर साक्षी भाव से उनका सजग प्रेक्षण वांक्षित है।

गांधी जी की आत्मा और देश का हाल : अमिताभ शुक्ल


 गांधी जी की आत्मा और देश का हाल :

 * अमिताभ शुक्ल

 गांधी जी की आत्मा गांवों में बसा करती  थी ,

 वह गांव आज भी हैं शिक्षा और स्वास्थ्य की अच्छी व्यवस्था से दूर.

 स्वच्छ पेयजल और पोषण से वंचित हैं गांव ,

 फिर भी हम कहते हैं भारत महान .

 सद्भाव और बंधुत्व  भी दूर हुए अब ,

 बसना पड़ता है शहरों में रोटी ,रोजगार के लिए .

 बापू का सपना करोड़ों आंखों में आज भी है,

 जुम्मन और रामू में न कोई भेद भाव है.

 किस तरह इबारतें लिखी जाएंगी सच्चे लोकतंत्र की ,

 जब नीचे से ऊपर तक व्यापार हैं.

 वोट कितना सस्ता हुआ अब इस सदी में ,

 जब बिना वोट के भी सरकार हैं.

 खरबों के पुल ,सड़कें , रेल गाड़ियां और मेट्रो ,

 फिर भी नहीं रोजगार हैं.

 बापू तो देते रहते हैं संदेश ,

 लेकिन सीख के अभाव हैं.

 लोकराज , स्वराज और कितनी दूर हुए ,

 मापने के नहीं औजार हैं.

 शिक्षाओं का असर रह गया बहुत काम बाकी ,

 फिर भी बापू  कइयों के लिए रोजगार हैं .

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित जन नेता महात्मा गांधी - अमिताभ शुक्ल

विश्व के सर्वाधिक प्रतिष्ठित  जन नेता महात्मा गांधी

 अमिताभ शुक्ल

महात्मा गांधी  संपूर्ण विश्व में माने जाने वाले जन नायक हैं.

 

किसी धर्म , संप्रदाय , राजनेतिक दल , सत्ता ,पद की स्थापना किए बिना उनके अतिरिक्त इतनी अधिक ख्याति और मान्यता का दूसरा उदाहरण दुर्लभ है. इस लिए यह कहा गया कि, सदियां उन्हें स्मरण करेंगी कि ," हाड़ मांस का बना कोई  ऐसा भी मनुष्य हुआ था ". गीता ताई पवनार आश्रम में रहने वालीं गीता की प्रकांड भास्यकार , विदुषी और देश भर में लोकप्रिय समाजसेवी थीं. उनसे एक बार वार्तालाप  के दौरान मैंने जिज्ञासा प्रगट की थी कि, गांधी जी कौन थे ? उनका उत्तर था कि, "गांधी जी विष्णु के १२ वें अवतार थे ".

विगत दिनों एक अन्य विदुषी के द्वारा भी इस कथन को उनके वक्तव्य में मैने पढ़ा .यह विचार आध्यात्मिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले विद्वत जनों का है.

भारत के सामान्य जनों के लिए वह " बापू " थे . आधी धोती शरीर पर लपेटे हुए बापू के आव्हान पर करोड़ पति धनाढ्यों ने अकूत जमीनें दान कर दीं थीं तो भारी भीड़ भरी जनसभाओं में और यत्र , तत्र धनाढ्य और सामान्य आर्थिक स्थिति की गृहिणी महिलाएं अपने जेवर न्योछावर कर दिया करती थीं.

जिनका उपयोग स्वतंत्रता के आंदोलनों , समाज के कमजोर वर्गों , स्त्रियों , बालकों की शिक्षा के लिए आश्रमों और संस्थाओं की स्थापना में किया जाता था.ठक्कर बापा , जमना लाल बजाज , क्रिलोस्कर सहित लंबी सूची थी गांधी जी के भक्त कुबेर पतियों की .

गांधी जी की वेष भूषा के कारण ही उन्हें " नंगा फकीर " तक कहा जाता था .

गांधी जी रहस्यमयी भी   थे . अन्यथा , केवल विचारों के आधार पर सत्य , अहिंसा ,शांति , सर्व धर्म समभाव , मित्वययिता,अछूतों की सेवा जैसी  शिक्षाओं को ( जिनका कड़ाई से उन्होंने स्वयं पालन किया ) वैश्विक स्तर पर इतनी मान्यता कैसे प्राप्त होती ?

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनूठी भूमिका निभाने वाले गांधी आजादी प्राप्त होने के बाद भी एक दिन भी शांत और निष्क्रिय नहीं रहे . जश्न मनाते देश में वह नोआखली के दंगों से उत्पन विषम स्थितियों में वहां थे , उपवास पर थे और देश भर में शांति और सद्भाव स्थापना के लिए कार्य करते रहे.

स्वतंत्रता के बाद छह माह भी शारीरिक रूप से उपस्थित न रहे.

और इस कारण यह देश , यहां का जनतंत्र , सत्ता की मशीनरी भी गांधी जी के विचारों के अनुरूप न बन सकी. लेकिन , लंबे समय तक आर्थिक नीतियों पर उनकी छाप निर्धनों , कमजोर वर्गों , स्त्रियों के लिए संजीवनी की भूमिका निभाती रही.

वर्ष १९२० / १९३० से अफ्रीका से प्रारंभ उनका संघर्ष एक शताब्दी पस्चात भी विश्व में अहिंसा , शांति , सामाजिक सद्भाव और सर्व धर्म सद्भाव के मूल्यों को लेकर कार्य करने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है.

गांधी जी के विचारों की प्रासंगिकता सर्व कालीन और सर्व व्यापी इस लिए है कि, समाज में अन्याय , स्वार्थ , विषमता ,शोषण विद्यमान है. इन प्रवर्तियो में परिवार , समूहों , समाज ,देश और विश्व में वृद्धि होती जा रही है.

मानवीय मूल्यों में विश्वास करने वालों के लिए गांधी जी के विचार आदर्श के रूप में हैं. जिनका पालन वह जारी रखे हुए हैं.

 अन्य दार्शनिक , धार्मिक ,आध्यात्मिक विचारों के समान गांधी के विचारों में विश्वास करने वालों को कोई शीघ्रता नहीं है , उनके प्रयत्न अवश्य जारी हैं क्योंकि ,यह संघर्ष न सत्ता का हे , न पूंजी और वैभव का और न विलासिता पूर्ण जीवन का .

यह संघर्ष परिवर्तन की धारा को जगाए रख कर अहिंसक विचारों द्वारा समाज में विकृत प्रवृत्तियों का बहिष्कार और तिरस्कार करने का है. ताकि , सद्भाव द्वारा वह आनंद प्राप्त किया जा सके जो परमानंद में परिणत हो जाता है जिसे अनुभूति द्वारा अनुभव किया जा सकता है ,वैभव और विलासिता की तराजू पर मापना संभव नहीं.

 

‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज-कवि: विवेक कुमार मिश्र,समीक्षक व सौन्दर्यविद डॉ. रमेश चन्द मीणा सहायक आचार्य- चित्रकला राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा

 ‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज पुस्तक शीर्षक: इस तरह आदमी कवि: विवेक कुमार मिश्र विधा: कविता संग्रह प्रकाशन: वेरा प्रकाशन, जयप...