शनिवार, 27 जनवरी 2024

(कहानी ) कर्मफल-- केदार शर्मा’’निरीह’’


 

कर्मफल

    आखिरकार मकान के नक्‍शे पर अंतिम निर्णय हो चुका था । स्‍मार्ट किचन ,ड्राईगं रूम ,सीढि़यां आदि मि. खन्‍ना ने तीन अलग अलग ड्राफ्टसमेन के नक्शों से मिलान करके स्‍वयं सेट किए थे ।‘सर इसमें मुख्‍य द्वार के सामने गेराज, उसके बांयी ओर भंडार कक्ष ,उससे सटे हुए लेट–बाथ एवं भीतरी द्वार के बांयी ओर सीढि़याँ  रखी गयी है ।‘’ ड्राफ्टमेन मि. खन्‍ना को नक्‍शे की सारी स्थि‍ति बारीकी से समझा रहा था। मकान बनने के बाद का भी एक काल्प‍निक चित्र तैयार किया गया था, यानि सब कुछ भव्‍य था।

    मि.खन्‍ना इसी जयपुर शहर में आबकारी विभाग में निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे ।अब तक परिवार सरकारी क्‍वार्टर में रह रहा था।  अब पॉश कॉलोनी में बने इस नए मकान के निर्माण में खन्‍ना साहबने अपनी पूरी उर्जा झौंक दी थी । कभी छुट्ट‍ियां ले कर तो तो कभी दफ्तर से गायब रहकर वे निर्माण कार्य में तत्परता  एवं तल्‍लीनता  से  कार्य कर  रहे थे। मिस्‍त्री एवं मजदूरों से पहले आना ,दिन में लंचटाइम में  या जब भी मौका मिले  उनको निर्देश  देना, उनके जाने के बाद सारी सामग्री को व्‍यवस्थित करना,आदि कार्य उनकी दिनचर्या के अंग  बन गए थे। घटों धूप में खड़ा  रहना ,यदा–कदा मजदूरों का हाथ बंटाना,किसी को व्‍यर्थ नहीं बोलने देना,नियमित हिसाब–किताब रखना आदि कार्यों में उनकी मेहनत देखते ही बनती थी। मेहनती स्‍वभाव के होने के बावजूद रात को सोते समय उनका शरीर थककर चूर हो चुका होता । सुबह देर से उठते और फिर उसी गोरखधन्‍धे में जुट जाते।

ज्‍यों –ज्‍यों मकान परवान चढ़ रहा था त्‍यों –त्‍यों खन्‍ना साहब का स्‍वभाव   चिड़चिड़ा होता जा रहा था। कब किस पर झल्‍ला पड़े कहा नहीं जा सकता। कोढ़ में खाज यह कि उन्‍ही दिनों उनका तबादला बीकानेर हो गया था, पर अभी गए नहीं थे। तय हुआ था कि नए मकान का उद्घाटन होने के बाद परिवार यहीं रहेगा और खन्‍ना साहब बीकोनर में ही सरकारी क्‍वार्टर में रह लेगें ।

 सो नए बंगले  उदघाटन की तैयारियाँ होने लगी । मेहमानों का आवागमन जारी था। पंडित लोग अपना कर्मकाण्‍ड कर रहे थे । मजदूर मिसेज खन्‍ना के निर्देशन में सामान जमा रहे थे। कुछ  रह गया सामान और और वृद्ध पिता को लेकर आए मि. खन्‍ना की कार बंगले के सामने आ कर रूकी । कार लॉक करके तेजी से मि.खन्‍ना अन्‍दर की ओर चले गए ।

     ‘’बहुत देर लगा दी आपने ,पण्डितजी नाराज हो रहें हैं । मुहुर्त का समय निकला जा रहा है। ‘कहते हुए मिसेज खन्‍ना ने चाय का कप पकड़ा दिया। चाय पीकर खन्‍ना साहब पण्डितजी के पास चले गए। तभी हाँफता हुआ एक बच्‍चा आया और बोला ,अंकल, कार में कोई रह गया है । अचानक खन्‍ना साहब को याद आया कि पिताजी को तो वह अन्‍दर लाना भूल ही गए। सभी उतसुकतावश बाहर की ओर भागे। मि.खन्‍ना ने दरवाजे  का लॉक खोलकर पिताजी को बा‍हर निकाला । बोले –‘ जब मैं उतरा था तब आपने कहा भी नहीं ,नींद आ गयी थी क्‍या ?

“बेटा, मैने सोचा कि मैं स्‍वयं गेट खोलकर उतर जाउंगा ,परन्‍तु बाहर से दरवाजा लॉक था”। गाड़ी के चारों ओर खड़े मेहमान और परिवारजन सब हँस रहे थे।“ यह भी खूब रही “ कहकर मि.खन्‍ना ने भी एक जोरदार ठहाका लगाया और पिता का हाथ पकड़कर सीढि़यों से ऊपर ले गए ।

          पिता को आश्‍चर्य मिश्रित दु:ख हुआ जब उनको भीतर नहीं ले जाकर भंडार-कक्ष में एक पलंग पर बिठा दिया गया । उन्‍होने कहा बेटा,मेरा पलंग अन्‍दर ही किसी कमरे में बिछवा देता तो अच्‍छा रहता।

“क्‍यों यहां क्‍या परेशानी है ? इतने जोर जोर से खाँसते हो । क्या मेहमानों को परेशानी नहीं होगी ? यह बच्‍चों की पढ़ाई का दौर है , क्‍या उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी? क्‍या उनकी पढ़ाई नहीं होने दूं “? मि. खन्‍ना बुरी तरह झल्‍ला रहे थे ।

उद्घाटन के बाद मि.खन्ना बीकानेर चले गए और बहु ओैर पोते पोती अपनी दुनियां में मस्‍त हो गए। वृद्ध पिता तन्‍हाई में डूबने लगे । अकेला पाकर विचारों के झुण्‍ड ने उनको घेर लिया। दिन-प्रतिदिन उनको लगने लगा मानो वे भंडार-गृह के  ऐसे  कुए में डूबते  जा रहें हों ,जिसका कोई तल नहीं हो । उन्‍होने अपना सारा जीवन  बेटे के लिए न्‍यौछावर कर दिया था । उसकी पढ़ाई में,साधन सुविधाओं में कोई कमी नहीं रहे,इसके लिए उन्‍होने खूब पैसा कमाया ।जमीन जायदाद की अच्‍छी खासी कमाई थी। वे खुद पास के गॉंव में पटवारी थे । ऊपरी कमाई के अलावा ऊँची ब्‍याज दर पर उधार  देकर उन्‍होने खूब धन जोड़ा था । उनहें याद आ रहा था कि किस तरह से वे पाँच रूपए की नकल के पाँच सौ रूपए लिया करते थे। जिस नामांतरण को नि:शुल्क खोला जाना था, उसके हजारों रूपए नाजायज रूप से उन्होंने वसूल किए थै । इन सब के दम पर बेटे ने राजकुमार सा जीवन जीया । और आज वह जिस पद पर प्रतिष्ठित है ,क्‍या व‍ह पृष्‍ठभूमि इसका आधार नहीं  रही है ? छत की ओर पथराई ऑंखों से देखते हुए उन्‍होने महसूस किया कि मष्तिष्‍क भारी हो रहा है ,मानो फटकर बाहर आ गिरेगा ।

         तभी बहू के चाय लाने की आवाज से उनकी तन्‍द्रा भंग हुई । चाय पास ही ताक पर रखकर बहू चली गई । जाते जाते हिदायत दे गई ,“ कप को धोकर अन्‍दर ही रख दीजिएगा।

           अब उनके बरतन भी अलग ही थे । बच्‍चे आकर थाली गिलास कटोरी ले जाते । खाना खाने के बाद वापस साफ करके कमरे  में रख जाते । उनके मन में ख्‍याल आया तो क्या वह अपने ही घर में अछूत हो गये है ।

           उनकी नजर सामने दीवार पर लगी तस्‍वीर पर पड़ी जिसमें अंगुली में सुदर्शन चक्र धारण किए भगवान कृष्‍ण की तस्‍वीर थी । नजर मिलते ही उन्‍हें प्रतीत हुआ मानो वे मन्‍द -मन्‍द मुस्‍कान के साथ कह रहें हों ,वत्‍स ,काश साधन सुविधाऍं और धन के साथ बच्‍चों को संस्‍कार भी दिए होते । पर तुमने तो सिखाया था,बुद्धू मत रहना,चालाक बनना । सीधे- सादे व्‍यक्तियों का जमाना नहीं है । उनकी ऑंखें डबडबा आई । हाँ भगवन , संस्‍कारों के तो मैने बीज ही नहीं बोए । मैंने तो कॉंटे बोए हैं  और अब वे चुभ रहें हैं तो मैं दु:खी क्‍यों हो रहा  हूँ ? वे जोर जोर से रोने लगे ।काश मैने गरीब किसानों का शोषण नहीं किया होता। तेज आवाज में चल रहे पंखो ओैर कूलर की आावाज में उनका रूदन कोई नहीं सुन पाया। अचानक हार्ट अटेक आया या ब्रेन हेमरेज ,पता नहीं ,पर उनके प्राण पखेरू उड़ गए ।

     मि. खन्‍ना को छुट्टियॉं लेकर बीकानेर  से तुरन्‍त वापस आना पड़ा । मृत्‍यु के बाद की सारी परम्‍पराऍं निभाई गई । इसी दौरान एक प्रतिष्ठित प्राइवेट लिमिटेड बैंक द्वारा अच्‍छी राशि पर मकान किराए पर लेने का प्रस्‍ताव आया । आशातीत किराया व  हर माह की पहली तारीख को खाते में राशि डालने सहित पॉंच साल में  खाली कर दिए जाने की शर्ते थी । अत: तय हुआ कि कि खन्‍ना साहब परिवार को भी अपने साथ ले जाएंगे । लगभग पाँच वर्ष का समय ही समय उनके रिटायरमेंट में बाकी था। अत: कुछ सामान स्‍टोर रूम में एवं बाकी साथ में ले जाने की योजना बनी और मकान किराए पर दे दिया गया । समय की विडम्‍बना कहें या परिवार का दुर्भाग्‍य, नए मकान में उनका महींने  भर भी रहना नहीं हुआ। भारी मन से परिवार बीकोनर के लिए रवाना हो गया ।

बीकानेर में खन्‍ना साहब को बड़ा सारा सरकारी क्‍वार्टर मिला हुआ था। परिवार की गाड़़ी एक बार फिर पटरी पर चलने लगी । समय पंख लगाकर फिर से भागने लगा। और खन्‍ना साहब के रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया । इस बीच बड़े लड़के बबलू सिंह का विवाह हो चुका था । उसके दो बच्‍चे  हो चुके थे । रिटायरमेंट के दिन एक शानदार पार्टी का आयोजन किया गया, साथ में बेटे के लिए वाटर प्‍लाटं का उदघाटन भी था । खन्‍ना साहब ने एक टयूब -वेल पांच साल की लीज पर लिया था। एक लॉरी उन्‍होने इसी उद्देश्‍य  से खरीद ली थी, जिसके माध्‍यम से मांग के आधार पर पानी सप्‍लाई किया जाना था । शुरू में धन्‍घा अच्‍छा चलने  लगा। दिन भर लॉरी को फुरसत नहीं मिलती थी । गर्मियों में पूरा परिवार सुब‍ह से शाम तक व्‍यस्‍त रहता था ।

 समय ने एक बार फिर करवट ली और गाड़ी पटरी से एक बार फिर तब उतर गई जब मिसेज खन्‍ना कोरोना की चपेट में आ गई गहन चिकित्‍सा ईकाइ में तीन दिन भर्ती रहीं पर उनको बचाया नहीं जा सका ।

मि. खन्‍ना भी अब बीमार रहने लगे थे। थोड़ी दूर चलने पर ही हॉंफने लगते थे । हाथ-पैर कांपने  काँपने लगते थे। ट्यूब वेल का पानी भी खारा हो जाने से पानी की आपूर्ति का धन्‍धा भी ठप्‍प हो चला था।उधर जयपुर में स्थित मकान को बैंक ने खाली कर कुछ औपचारिकताऍं पूरी करने हेतु खन्‍ना साहब को फोन किया । अस्‍वस्‍थता के चलते  मि. खन्ना ने अपने बेटे बबलू  सिंह को ही भेजा । वापस आकर बबलू सिंह ने बताया कि मकान पूरी तरह से खाली  हो गया है  और उसी कॉलोनी में मुख्‍य मार्ग पर एक दुकान बिकाउ है। और उसने उसमें शराब की दुकान के लिए लाइसेंस के लिए आवेदन कर दिया है । अत: अच्‍छा है अब परिवार जयपुर के  नए मकान में ही रहने लग जाए ।

 बेटे की जिद के आगे मि.खन्ना की कुछ भी नहीं चली । बेटे के रोजगार का सवाल था । पचास लाख रुपए देकर नई दुकान खरीद ली गई ।

खन्‍ना साहब के रसूख के चलते आसानी से शराब का लाइसेंस मिल गया था । नई दुकान का उद्घाटन तयशुदा  मुहुर्त पर हुआ। तैयारियाँ होने लगी । अपने नए शानदार बंगले में रहने के उत्‍साह ने बबलू सिंह,उसकी पत्‍नी और बच्‍चों के पैरों में मानो पंख लगा दिया थे । सो आनन-फानन में सामान नए मकान में पहुँचाया जाने लगा। नई दुकान के उदघाटन के दिन एक शानदार पार्टी का आयोजन रखा गया । आमन्त्रित मेहमानों की चहल–पहल शुरू हो गई । मजदूर मिसेज  बबलू सिंह के निर्देशन में सामान जमा रहे थे । चाय और नाश्‍ते का दौर चल रहा था । हँसी के ठहाके लग रहे थे। तभी बबलू सिंह की कार दोनो बच्‍चों और मि. खन्‍ना को लेकर नए बंगले के सामने  आकर रूकी । बच्‍चे तो  फुर्ती से उतर कर अन्‍दर  भागे । कुछ सामान उतार कर अन्‍दर चले गए। पिछली  सीट पर बैठे खन्‍ना साहब के मष्तिष्‍क में विचारों के बवंडर उठ रहे थे । जिस नए मकान में आज वे रहने जा रहे थे उसकी एक एक ईंट उनके सामने और उनकी देख रेख में लगी थी । नक्‍शा बनवाने से लेकर धूप में खड़े रहकर तराई करने के दृश्‍य उनकी ऑंखों के सामने चलचित्र की तरह घूम रहे थे । इसी मकान में रहने के सपने कितने अरमानों से उन्‍होने संजोए थे। अचानक उनके मुँह से निकला, समय से पहले और भाग्‍य  से जयादा किसी  को  नहीं  मिलता है।‘

भीतर सभी चाय की चुस्कियॉं ले रहे थे । बहू ने चाय के लिए आवाज लगाई तभी बबलू सिंह को याद आया कि पिताजी तो शायद कार में से उतरकर ही नहीं आए।उसने बच्‍चों को देखकर आने के लिए भेजा। बच्‍चों ने कार का गेट खोलकर देखा तो दादाजी ऑंखें बन्‍द किए बैठे थे। सब बच्‍चे  हँसने लगे ,अरे ! दादाजी को तो नींद आ गई । तब तक बबलू सिंह आ गया था ।‘’हाँ बच्‍चों,कार में अकसर मुझे नींद आ जाया करती है । ‘’खन्ना साहब ने झूठ बोलकर बात को किसी तरह साधा।पर उनके मन में स्मृतियों  के बवंडर उठ रहे थे। ‘कमाल है आप कार में ही बैठे रह गए ?उतरने का इरादा नहीं था क्‍या ?‘’ बबलू सिंह ने एक जोरदार ठहाका लगाया ।

    स्‍टोर रूम का दरवाजा खुला था । वह खन्‍ना साहब को कलाई पकड़कर सीधे वहीं ले गया और उसी पलगं पर बिठा दिया हालाकि उनके कदम सीधे अन्‍दर जाने को  मुड़ गए थे । आखिर उनके मुँह से निकल ही गया। ‘बेटा,मुझे अन्‍दर ही किसी कमरे में ले जाते तो ठीक रहता।‘‘

‘पापा कैसी बातें करते हैं आप ? आप यहीं रहेंगे तो  बाहर का ध्‍यान रख सकेंगे । यहॉं किसी तरह का शोरगुल भी नहीं रहेगा । आप चाहें तो शांत चित्‍त होकर पूजा पाठ भी कर सकते हैं । यहाँ लेट-बाथ भी पास ही हैं,आपको पकड़कर लाना पड़ता है।आपके हाथ-पाँव तो काँपते है,कहीं गिर गिरा गए तो दिक्कत तो हमे ही होगी। ‘कहकर बेटा भीतर चला गया । खन्ना साहब को बुरा तो लगा पर बेटे की बात तर्कसंगत थी। सो माननी पड़ी। वे उसी पलंग पर बैठ गए जिस पर किसी दिन उन्होंने जानबूझकर  किसी दिन अपने पिता को बिठाया था। 

थोड़ी देर में बहू चाय लेकर आ गई ।स्मृतियाँ और तेजी से दौड़ने लगी। उनको याद आया यह वही कप था जिसे पिताजी चाय पीकर वहीं रख देते थे । खाने  के बरतन,थाली,कटोरी और गिलास उन के लिए सब वही रख दिए गए थे जो उन्‍होने अपने पिताजी के लिए रखवाए थे । अंतर इतना ही था कि उन्होंने सब कुछ जानबूझकर अहंकारवश किया था,पर अब वे सभी संयोगवश और सहज रूप से सब घटित हो रहा था।

    चाय पीकर लेटे तो सामने दीवार पर वही चित्र लटका था जो उन्‍होने अपने पिताजी की तीए की बैठक के लिए बनवाया था। उनके चित्र के पास ही भगवान कृष्‍ण की वही तस्वीर जिसमें भगवान कृष्‍ण उंगली में चक्र धारण किए हुए थे। उन्‍होने चित्र की ओर गोर से देखा । ऐसा प्रतीत हुआ मानो पिताजी कह रहें हों ,’बेटा, अपने कर्म के बीज ही देर-सवेर पककर वृक्ष बनते हैं आौर अपना फल देते हैं ।

    ‘अचानक खन्‍ना साहब का गला भर आया,ऑंखों में आसूँ आ गए। उनको याद आया कि किस तरह से उन्होंने बेशुमार रिश्‍वत ली थी और अवेध शराब की भट्टियों को चलने दिया था। कई शराबके  लाइसेंस उन्होंने भारी-भरकम रिश्‍वत के बदले में दिलवाए।

  पश्‍चाताप की वेदना से त्रस्त होकर वे फूट-फूट का रोने लगे । भीतर चल रहे पंखे और कूलर की तेज आवाजों में उस रुदन को कोई नहीं सुन सका । खन्‍ना साहब को लगा मानो वे किसी तलहीन कुए में डूबते जा रहें हों । पश्‍चाताप और कर्मफल मिलकर उनको मानो ऊपर से नीचे धकेल रहे था।

हिन्दी कविता : पाठक की तलाश में- डॉ.मनु शर्मा


 

हिन्दी कविता : पाठक की तलाश में

 

कविता के पाठकों में हो रही कमी के बहाने हम आज साहित्य को पढ़ने वालों की खोज पर बात कर रहे हैं। साहित्य के पाठक इस उत्तर आधुनिक समय में खोज का विषय हो गये हैं। हालांकि पहले भी कविता, कहानी या उपन्यास पढ़ने वालों की संख्या बहुत नहीं होती थी। महाकवि भवभूति तो अपने किसी समानधर्मा के उत्पन्न होने की आस में ही लिखते रहे। गोस्वामीजी भी कह गये हैं- 'जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।' इसलिए साहित्य रसिकों की प्रजाति के एकदम लुप्त होने का खतरा पैदा हो जाने जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन कभी-कभी यह प्रश्न काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आज सृजनात्मक साहित्य के रूप में जो कुछ लिखा जा रहा है, वह किसके लिए है?

अब तो लगता है जो लिख रहे हैं, वे ही अपने लिखे हुए के पाठक हैं। यह स्थिति खुद कवियों ने ही बनाई है। उनकी ठसक के चलते सामान्य समझ के पाठक ने तो उनको दूर से प्रणाम करने में ही अपनी बेहतरी समझी है। वररुचि ने तो यह कहकर सामान्य पाठक से किनारा कर लिया कि 'अरसिकेषु रसस्य निवेदनं शिरषि मा लिख, मा लिख, मा लिख।' कौन रसिक है और कौन अरसिक इसकी कोई सर्वमान्य कसौटी तो हो नहीं सकती। 'भिन्नाः रुचिर्लोकाः ।'

कविता की पठनीयता को लेकर गुरुदेव टैगोर ने एक महत्त्व पूर्ण बात कही है। उनके अनुसार 'जिन सब कविताओं में प्रथागत भाषा और छन्द का अनुसरण किया जाता है, उनमें अन्ततः बाहर की ओर से पाठकों के चलने-फिरने में रुकावट नहीं होती। लेकिन कहीं-कहीं विशेष किसी रस के अनुसंधान में कवि को अभ्यास का पथ लांघना पड़ता है। तब कुछ न कुछ समय के लिए पाठक के आराम में बाधा पड़ती है। इसीलिए वे नये रस को इस तरह भीतर ले आना अस्वीकार करते हैं और दण्ड देने की बात कहते हैं।' (रवीन्द्र रचना संचयन, पृ. 665) पाठक द्वारा किसी कवि की उपेक्षा ही उसके लिए सबसे बड़ा दण्ड है। और कवि को यह तब भुगतना पड़ता है जब कोई कवि काव्य रचना की प्रचलित परिपाटी को छोड़कर अपने लिए नई राह खोजता है। निस्सन्देह ऐसे कवियों के साथ पाठक अपने काव्य संस्कार का तालमेल नहीं बैठा पाता। वह उसे कवि के द्वारा बनाई गई नई राह पर चलने से रोकता है। कवि के द्वारा वस्तु और शिल्प के स्तर पर किये गये प्रयोग पाठक को अपने अर्जित काव्य संस्कार को ध्वस्त करते प्रतीत होते हैं। वस्तुतः काव्य विधान की प्रचलित परिपाटी से बनी उसकी मनोरचना का नई उपमाओं, नये बिम्बों, बदले हुए प्रतीकों और नई काव्य भाषा से अनुकूलन नहीं हो पाता है। इसलिए उसे लगता है कि कविता का चरित्र बदल गया है। उसकी बोली-बानी इन कविताओं में नहीं है। वह भवानी प्रसाद मिश्र के शब्दों में कवि से यह उम्मीद करता है: 'जैसा हम बोलते हैं/वैसा तू लिख/फिर हमसे बड़ा दिख।'

'उस पार' की बातें करके कोई कवि पाठक का विश्वास नहीं पा सकता। आम जनता के दुख-दर्द की समझ, उसके प्रति करुणा का भाव, उसके जीवन संघर्ष में सहभागी बने होने का सन्देश, जो उसकी बोलचाल की भाषा में प्रकट हुआ हो, वही पाठक को स्वीकार होता है। बाकी कविता के नाम पर किये जाने वाले तमाम प्रयोग पाठक की प्रतीक्षा में केवल काव्य संग्रहों का हिस्सा बन कर रह जाते हैं।

यह सच है कि कविता रचते समय कोई कवि उसकी पठनीयता के बारे में नहीं सोचता । और उससे यह मांग भी नहीं की जा सकती। इस फेर में पड़ जाने पर कवि के लिए कविता लिखना ही संभव नहीं रह जायेगा। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि एक लिखित या प्रकाशित कविता कवि की निजी सम्पत्ति नहीं रह जाती है। वह सामाजिक सम्पत्ति होती है। अतः केवल स्वान्तः सुखाय की बात कहकर कवि अपनी सामाजिक जवाबदेही से हाथ नहीं झाड़ सकता। कवि होने के नाते पाठक या कह लीजिए जनसाधारण की तुलना में उसकी जिम्मेदारी ज्यादा होती है। संस्कृतिकर्मी होने के कारण कवि को सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों के संरक्षण हेतु सदा पहल करनी पड़ेगी। इतना भर मान लेने से काम नहीं चलता कि हमने तो लिख दिया अब कोई समझे या न समझे। ऐसी सोच रखने वाले कवियों ने ही यह कहने का दुस्साहस किया है : 'आगे सुकवि समुझे तो कविताई, न तु राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानो है।' सुकवियों की तो बात ही छोड़िये ऐसे कवियों की कविता को साधारण पाठक ने भी कविता का गौरव प्रदान नहीं किया। पाठक के विवेक को इतना कमतर नहीं आँकना चाहिए कि कविता के नाम पर जो कुछ भी अंटशंट बक दिया जाये, उसे वह स्वीकार कर लेगा।

कविता में साधारण पाठक को आकर्षित करने वाला तत्त्व है, विह्वलकारिता। यहाँ विह्वल कर देने से अभिप्राय भावाकुल कर देना नहीं है। बल्कि पाठक की निजता का लोप है। कई कवितायें ऐसी होती है जिन्हें पढ़कर या सुनकर कुछ देर के लिए हम अपने आपको भूल जाते हैं। वे हमारे मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह छा जाती है। और यह तभी होता है जब कविता के रचना तत्त्वों में सामंजस्य हो। यानी उसमें भाव, विचार, संवेदन और भाषा के स्तर पर विलक्षण संतुलन हो। इसी को काव्य सौन्दर्य कहते हैं।

जो कविता सरल हो और जिसे सुनकर शत्रु भी बैर भाव मूल जाये, वही सहृदय और विचारशील लोगों द्वारा सराही जाती है -

सरल कवित्त कीरति विमल सोइ आदरहि सुजान।

सहज बयर बिसराई रिपु जो सुनि करहि बखान।।

कविता सुनकर शत्रु का बैर भाव भूल जाना और कुछ नहीं उसकी निजता का अतिक्रमण है। उसका मनुष्यता की उच्च भावभूमि में प्रवेश है। एक कवि की संस्कृतिकर्मी के रूप में यही भूमिका होती है। प्रसिद्ध काव्यवेत्ता कॉडवेल ने ठीक ही कहा है 'कविता वह है, जो पढ़ने पर घटित होती है। यानी जो कविता पढ़ने पर पाठक में ठीक वे ही अनुभूतियाँ जगाती है, जैसी उसकी रचना करते हुए स्वयं कवि के मन में पैदा हुई। ऐसी कविताओं के लिए किया गया श्रम व्यर्थ नहीं होता।

एक बाता में यहॉं विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि कविजन आम जगता से अलग अलग होकर कविता लिखने की जुगत में न रहे। कविता लिखने के अभ्यास, कल्पनाशीलता और काव्यशिल्प को सामा लेने से कविता का ढाँचा तो बन जाता है, लेकिन वह निर्जीव होता है। जीवन और जगत से घनिष्ठ सम्पर्क ही कविता में प्राण फूकता हैं। उस पार की कवितायें अपने शब्दाडम्बर से कुछ देर के लिए पाठक को चमत्कृत अवश्य कर देती है, लेकिन वे उसकी स्मृति का जा नहीं बन पाती। जीवन यथार्थ की मार्मिक व कलात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कवियों से किसी पाठक को यह शिकायत नहीं होती कि वे सरल चीजों को जटिल क्यों बनाते है।' यह शिकायत केवल उन्हीं से है, जो कविता के नाम पर व्यर्थ का तूमार बांधते है।

 

 

 

इससे यह निष्कर्ष निकालना सरासर भूल होगी कि वर्तमान में जो कवितायें लिखी जा रही हैं, वे सब व्यर्थ का श्रम है। कई कवि आज भी अच्छी कवितायें लिख रहे हैं। उनकी कविताओं में जीवन अपनी सम्पूर्ण भव्यता और भयावहता के साथ उपस्थित है। पर कोयले के ढेर में काला हीरा खोजना आसान नहीं होता। जब अधिकाश कवि एक जैसी कवितायें लिख रहे है, तो अच्छी कवितायें अम्बार में दबी रह जाती हैं। पाठक के पास इतना अवकाश नहीं है कि वह यह खोज करे। हाँ, बदले हुए काव्य परिदृश्य को ध्यान में रखकर पाठक को अपना 'माइण्डसैट' अवश्य बदलना चाहिए। उसे अपनी अभिरुचियों और काव्य संस्कार को परिष्कृत करना चाहिए। यदि अभी तक वह भक्तिकालीन या छायावादी कविताओं की आस में है तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। हर युग की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, काव्य के प्रेरक तत्त्व अलग होते हैं। उन्हीं से कविता की बुनावट होती है। उन परिस्थितियों और प्रेरक तत्त्वों को ध्यान में रखकर पाठक यदि आज की कविताओं को पढ़े तो मुझे विश्वास है कि उसे निराश नहीं होना पड़ेगा।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2024

उत्सव- अमिताभ शुक्ल (कवि,लेखक और अर्थशास्त्री)




 

उत्सव

उत्सव भुला देते हैं दुखों को कुछ समय के लिए  ,

महा उत्सव अदृश्य कर देते हैं समस्याओं को ,

ढोल , ढमाकों की गूंज में दब जाती हैं भूख की आवाजें ,

खुशी के प्रदर्शन का जलजला कायम रखते हैं उत्सव 

जाहिर है जो दुखी होंगे वह नहीं मना पाएंगे उत्सव ,

गमों को भूल पाना कठिन होता है उनके लिए ,

इस तरह बाहर रहते हैं वह उत्सवों से ,

उत्सवों के लिए जरूरी होती हैं रंग ,बिरंगी पोशाखें .

कितना अच्छा होगा वह दृश्य जिसमें सब दिखेंगे एक साथ ,

लिए हाथ में हाथ और कोई गम न होगा किसी के साथ ,

नहीं छपवाना होंगे विज्ञापन , इस्तहार और समाचार ,

लोगों की खुशी के उस दिन .

अमर जवान- जयचन्द प्रजापति 'जय'

अमर जवान

.........

 अमर जवानों को

याद करो यारों

 राष्ट्र के लिए

बलिदानों को

याद करो

 अमर जवानों के

समाधि स्थल पर

दीप जलाओ यारों

 श्रद्धा सुमन

बरसाओ यारों

प्यारा तिरंगा

........

ये प्यारा तिरंगा

लहराए गगन मे

वीरो की गाथा गाए

ये प्यारा तिरंगा

तीन रंगों से

सजा है प्यारा तिरंगा

नव भारत की शान है

प्यारा तिरंगा

गली गली में

लहराए

प्यारा तिरंगा

नवगीत सुनाए

ये प्यारा तिरंगा



 

गणतंत्र दिवस भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है जो हमें एक विकसित भारत बनाने में अपना योगदान देने के लिए संवैधानिक रूप से और समान रूप से निर्देशित करता है: डॉ.कमलेश मीना।


 

गणतंत्र दिवस भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है जो हमें एक विकसित भारत बनाने में अपना योगदान देने के लिए संवैधानिक रूप से और समान रूप से निर्देशित करता है: डॉ.कमलेश मीना।

 

75वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ! आइए हम भारतीय लोकतंत्र के इस शुभ दिन पर हर किसी को दिल की गहराइयों से और तहे दिल से हार्दिक शुभकामनाएं देने के लिए आगे आएं।

 

आइए हम भारत के 75वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर, हम आगे आएं और शपथ लें कि हमारे देश में कोई भी पीछे नहीं रहेगा और सभी को समान अवसर दिया जाएगा ताकि सभी सशक्त हो सकें। जय हिंद, जय भारत, जय संविधान!

आइए हम सबसे पिछड़े, वंचित, हाशिये पर पड़े और गरीब लोगों को आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और संवैधानिक रूप से सशक्त बनाने के लिए अपना बड़ा दिल दिखाने के लिए आगे आएं।

भारत का नागरिक होने के नाते, मैं आप सभी को ढेरों शुभकामनाओं और हार्दिक बधाइयों के साथ 75वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

26 जनवरी, वह तारीख जब भारत में पहली बार हमारे लोकतंत्र का जन्म हुआ। इसी दिन हमारा संविधान भी तैयार हुआ था। वो संविधान जिसकी शपथ लेकर देश की अदालतें फैसले लेती हैं, वो संविधान जिसकी शपथ लेकर भारतीय लोकतंत्र के हमारे चुने हुए प्रतिनिधि कोई भी निर्णय लेता है। वो संविधान जिसकी शपथ लेकर देश के राष्ट्रपति, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश और प्रत्येक सरकारी कर्मी कोई भी निर्णय लेता है। 75 साल पहले 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र दिवस के रूप में चुना गया था। तब से लेकर आज तक हम हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं।

भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाता है लेकिन इसकी वजह संविधान नहीं बल्कि कुछ और है। दरअसल, 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद भी हमारा देश बिना आधिकारिक संविधान के था। इसलिए 29 अगस्त 1947 को संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया गया। इस समिति की अध्यक्षता डॉ. बी.आर. ने की और के.एम. मुंशी, मुहम्मद सादुल्लाह, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, गोपाल स्वामी अयंगर, एन.माधव राव और टी.टी. कृष्णामाचारी 308 जैसे बड़े दिग्गज संविधान मसौदा समिति में शामिल थे।

आइए हम यह सुनिश्चित करने के लिए आगे आएं कि किसी को भी उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा और सभी के साथ समान व्यवहार किया जाएगा, संवैधानिक रूप से उन्हें भारतीय लोकतंत्र, संविधान की प्रस्तावना और एक विकसित, समृद्ध और समृद्ध देश की भावना के अनुसार सशक्त बनाया जाएगा। यही भारत के 75वें गणतंत्र दिवस को मनाने का वास्तविक अर्थ है और हम सभी को अपने देश की अगली पीढ़ी के भीतर इस भावना को सुनिश्चित करना है।

आप सभी को गौरवपूर्ण और आनंदमय गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ! आइए हमारे लोकतंत्र की सुंदरता की सराहना करने के लिए कुछ समय निकालें, जहां हर आवाज मायने रखती है। लोकतंत्र में हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है, समान है। भारत के नागरिक होने के नाते आइए हम अपनी शिक्षा, अनुभव, विशेषज्ञता, ज्ञान का उपयोग समाज में सकारात्मक योगदान देने के लिए करें, जिससे हमारा देश मजबूत और अधिक जीवंत बने। जैसे-जैसे हम एक और गणतंत्र दिवस के करीब आ रहे हैं, आइए उन चीजों के बारे में सोचें जो हमें एक देश के रूप में एक साथ लाती हैं। आज का दिन हमारे संविधान की बदौलत लोकतंत्र, एकता और स्वतंत्रता का जश्न मनाने का दिन है। इस दिन को हमें नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों को याद रखना चाहिए और भारत को मजबूत और अधिक शांतिपूर्ण बनाने में मदद करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जैसा कि हम गणतंत्र दिवस के लिए एक साथ आते हैं, यह एक विशेष समय है जो हमारे अतीत और भविष्य को जोड़ता है। हमें उन लोगों को याद रखना चाहिए जिन्होंने हमारे देश के लोकतंत्र के लिए बलिदान दिया। निष्पक्षता और समानता का मार्गदर्शन करने वाले हमारे संविधान की शुरुआत इसी दिन हुई थी। आइए उन कर्तव्यों के बारे में भी सोचें जो यह हममें से प्रत्येक को देता है। हमें अपने संविधान में मूल्यों का समर्थन करने का वादा करना चाहिए और अपने देश को मजबूत और एकजुट बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।

हमारी लोकतांत्रिक यात्रा में छात्र वास्तव में महत्वपूर्ण हैं। छात्र इस अद्भुत राष्ट्र के भविष्य के नेता, विचारक और निर्माता हैं। आइए आज न केवल गणतंत्र दिवस समारोह का आनंद लें बल्कि यह भी समझें कि यह दिन महत्वपूर्ण क्यों है। भारत के नागरिक के रूप में, हमारे देश के लोकतांत्रिक आदर्शों को जीवित रखने की जिम्मेदारी हमारी है। आइए अपने कार्यों में निष्पक्षता, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के सिद्धांत दिखाएं। हम भलाई की ताकत बनें, अपने प्यारे भारत को आगे बढ़ने और समृद्ध होने में मदद करें।

आज सिर्फ एक दिन की छुट्टी या देशभक्ति का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह सोचने का समय है कि हमारे देश को महान क्या बनाता है। यह वह दिन है जब हमने अपना संविधान अपनाया था, नियमों का एक विशेष सेट जो दर्शाता है कि एक स्वतंत्र भारत का सपना क्या है। तीन रंगों वाला झंडा दिखाता है कि कैसे हम सभी अलग-अलग हैं लेकिन फिर भी एक साथ हैं, हमारी आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों को धन्यवाद। भारत के नागरिक के रूप में, हमें अपने संविधान में महत्वपूर्ण विचारों का पालन करना चाहिए: निष्पक्षता, स्वतंत्रता, समानता और एकजुटता। आइए उन स्मार्ट लोगों से सीखें जिन्होंने हमारे भविष्य की योजना बनाई और एक ऐसा देश बनाने का वादा किया जहां सभी के अधिकार और सम्मान सुरक्षित हों।

हमारे देश को एक विकसित देश बनाने की कहानी में, हम भारत के नागरिक को बहुत बड़ा काम करना है। आइए इस गणतंत्र दिवस पर हमें अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करें जिससे हमारे देश को आगे बढ़ने में मदद मिले। आज हम अपनी विभिन्न संस्कृतियों का आनंद लेते हैं, आइए यह भी याद रखें कि हम सभी जुड़े हुए हैं। आइए आज शिक्षा, नए विचारों और दूसरों के लिए अच्छे काम करने का वादा करें। गणतंत्र दिवस की भावना हमें अपने देश पर गर्व महसूस कराए, हमें भारत को स्वतंत्रता और प्रगति के साथ एक महान स्थान के रूप में चमकाने के लिए प्रेरित करे। आज, हम अपने संविधान में स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र के विचारों का जश्न मनाने के लिए एक साथ आए हैं। यह विशेष दिन, 26 जनवरी, वह दिन है जब हमारी आजादी के लिए बहादुरी से लड़ने के बाद हमारे पूर्वजों के सपने सच हुए। जब हम तीन रंगों वाला झंडा फहराते हैं, हमारे देश के लिए किए गए कई बलिदानों को याद करें। हमारे संविधान के महत्वपूर्ण सिद्धांत -भाईचारा, बंधुता समानता, न्याय, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता और एकजुटता - हमें आगे का रास्ता दिखाते हैं।

प्रिय दोस्तों, भारत के नागरिक के रूप में, हम ही हैं जो अपने देश के भविष्य को आकार देंगे। आइए हम जिम्मेदार नागरिक बनने का वादा करें जो समाज के लिए अच्छे काम करेंगे। हमारे मतभेद हमें मजबूत बनाते हैं, और इस गणतंत्र दिवस पर, आइए उन कई संस्कृतियों का आनंद लें जो भारत को विशेष बनाती हैं। हमारे कार्य हमारे संविधान के सिद्धांतों को दर्शाते हैं, जिससे एक ऐसी जगह का निर्माण होता है जहां हर व्यक्ति के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है। जैसे-जैसे हम उत्सवों का आनंद लेते हैं, आइए अपने देश की सेवा करने का भी वादा करें, यह सुनिश्चित करते हुए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका भविष्य उज्ज्वल हो।

आइए आज उन लोगों को याद करें और उन्हें धन्यवाद दें जिन्होंने हमारी आजादी के लिए लड़ाई लड़ी और हमारा संविधान बनाया। तीन रंगों वाला झंडा सिर्फ हमारे देश के बारे में नहीं है; यह भाईचारा, बंधुता समानता, न्याय, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता, स्वतंत्रता और एकजुटता जैसे महत्वपूर्ण विचारों के बारे में भी है जो हम सभी को एक साथ लाते हैं। यह गणतंत्र दिवस हमारे मतभेदों का जश्न मनाने और यह देखने का समय है कि जब हम एकजुट होते हैं तो हम कितने मजबूत होते हैं।

भारत के नागरिक के रूप में, हम अपने देश का भविष्य हैं, आइए इसे आकार देने की अपनी शक्ति को याद रखें। आइए अपनी शिक्षा का उपयोग नई चीजें सीखने और प्रगति करने के लिए करें। आइए इस दिन एक ऐसा समाज बनाने का वादा करें जो हर किसी का स्वागत करता हो और हर व्यक्ति के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करता हो। गणतंत्र दिवस हमें एक खुशहाल और समृद्ध भारत के निर्माण में मार्गदर्शन दे। सभी को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ!

आइए हम एक बहुत मजबूत, सुंदर, समृद्ध, विकसित और अच्छी तरह से सुसज्जित देश बनाने के लिए आगे आएं जो इस ब्रह्मांड में प्रत्येक कमजोर व्यक्ति की रक्षा करे और विश्व स्तर पर नेतृत्व करने की जिम्मेदारी ले।

आइए हम अपने संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक समृद्ध यात्रा को अन्य देशों को दिखाने के लिए आगे आएं जो हमें बड़े भाई के रूप में देख रहे हैं।

आइए हम इस दिन न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के प्रत्येक नागरिक को बधाई देने के लिए आगे आएं ताकि भारत की महिमा, नाम, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और गरिमा दुनिया भर में फैल जाए क्योंकि हमारे पूर्वज सभी की मदद करने के लिए जाने जाते थे।

आइए हम भारत के 75वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर सबसे पिछड़े, वंचित, हाशिए पर मौजूद और गरीब लोगों को आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक, भावनात्मक, बौद्धिक और संवैधानिक रूप से सशक्त बनाने के लिए अपना बड़ा दिल दिखाने के लिए आगे आएं। आप सभी को मेरी हार्दिक बधाई, शुभकामनाओं के साथ गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 

सादर।

डॉ कमलेश मीना,

सहायक क्षेत्रीय निदेशक,

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, इग्नू क्षेत्रीय केंद्र भागलपुर, बिहार। इग्नू क्षेत्रीय केंद्र पटना भवन, संस्थागत क्षेत्र मीठापुर पटना। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

 

एक शिक्षाविद्, स्वतंत्र सोशल मीडिया पत्रकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष लेखक, मीडिया विशेषज्ञ, सामाजिक राजनीतिक विश्लेषक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत वक्ता, संवैधानिक विचारक और कश्मीर घाटी मामलों के विशेषज्ञ और जानकार।

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गुरुवार, 25 जनवरी 2024

मुखौटे- डॉ. विजेन्द्र त्रिपाठी


 

मुखौटे

 

हम सभी जी रहे हैं

अपना-अपना जीवन

सहजता के धरातल से दूर..

बहुत दूर!

 

कई मुखौटे लगाए हुए,

मुखौटे-

रंग के रूप के,

दर्प के असीमित ज्ञान के!

मुखौटे-

सत्य के मानवता के,

झूठी मुस्कानों के..

मगरमच्छी आंसुओं के!

और मुखौटे..

न जाने कौन-कौन से!

 

ये मुखौटे..

छिपाए रहते हैं सत्य को

राख में दबी किसी चिंगारी की तरह,

मगर कभी-कभी

हवा के किसी निर्मम झोंके से

यह राख उड़ भी जाती है

और प्रज्वलित होती है चिंगारी

शोलों की शक्ल में!

तब हृदय में जागती है

घृणा.. वितृष्णा

उस मुखौटेहीन चेहरे के लिए,

किंतु तब हम भूल जाते हैं

अपने चेहरे पर लगे मुखौटों को

क्योंकि आईने में भी हमें अपना प्रतिबिंब

मुखौटों सहित ही नज़र आता है!

 

कभी-कभी यह व्यथित मन

चीत्कार कर उठता है-

"कितनी कृत्रिम..

कितनी अस्वाभाविक है यह ज़िंदगी!"

पर तभी दूर क्षितिज से आवाज़ आती है-

यही स्वाभाविक है!

शायद यही स्वाभाविक है!!

सहारे तलाशना बन्द करो- अशोक सक्सेना


 

सहारे तलाशना बन्द करो

धीरे-धीरे

तुम में समा गया है

असुरक्षा का भाव

बन्द मुट्ठियों से

रेत की तरह झर जाने का भाव

तुम्हारे चेहरे पर उग आयी है

बेबस लाचारी

सहारे तलाशना छोड़ो

एक पल

रेत के टीले पर बैठे बच्चे को निमित भर देखलो

कैसे दोनों हथेलियों से

रेत से खेल रहा रेत का खेल

जीवन का उपक्रम है खेल रेत का

इस खेल को एक खिलाड़ी की तरह खेलो

सहारे तलाशना बन्द करो।

यह मेरा घर है- जयचन्द प्रजापति 'जय'


 हां, यह मेरा घर है

...........

रीना की शादी एक ऐसे लड़के के साथ हुई थी जो शराबी था।शराब पीता था। बाहर जाकर अय्याशी करता था और रात में रीना को मारता था। घसीट-घसीट कर मारता था।लात घुसों से मारता था। जमीन पर पटक देता था। बालों को खींच कर मारता था। ऐसा था रीना का पति। जल्लाद सा हो जाता था। बेचारी रीना कुछ नही बोलती थी।

रीना पति को भगवान की तरह मानती थी। वह बेचारी सीधी सादी थी। पति को कभी कुछ नहीं कहती थी कि तुम तुम मेरे साथ बहुत गलत करते हो वह कुछ इसलिए नहीं कहती क्योंकि जब वह विरोध करती तो वह और मारता पीटता था। ज्यादा न मारे इसलिए मार खाते वक्त वह विरोध नही करती थी। इस तरह से मार खाते-खाते बहुत दुबली पतली हो गई थी।

रीना ने सोचा यही हाल रहेगा तो जीवन कैसे चलेगा। एक दिन फिर उसका पति शराब पी कर आया और रीना को मारा पीटा कहा कि तुम मेरे घर से निकल जाओ। आज उसने रात में निर्णय ले लिया। इस घर को छोड़ने को। एक झोले में अपना सारा सामान पैक कर लिया। एक-एक चीज भर रही थी। वह उस घर से रिश्ता खत्म करने जा रही है।

एक तस्वीर में रीना और उसके पति की तस्वीर थी। एक बार सोचा लूं या नहीं लूं। फिर कुछ सोच कर रख ली। पूरे गहने, कपड़े कोई चीज नही छोड़ा था।

 

बिना बताए वह भोर में झोला उठाया और बार-बार घर के अंदर की एक-एक चीज भी निगाहों में समेटना चाह रही थी। नही-नही यह तो मेरा घर है। सामान अपने घर में रखूंगी । मैं भी जल्दी चली आऊंगी। मैं बहुत प्यार करती हूं अपने पति से। मैं चली जाऊंगी तो अकेले कैसे रहेगा। मैं जा रही हूं। कुछ दिन में चली आऊंगी। यह मेरा घर है। झोला वही रख कर बहुत दुखी मन से वह निकल गई।

सुबह जब रीना का पति उठा। रीना को उसकी निगाहें तलाशने लगी। रीना कहीं नजर नहीं आ रही थी। रीना का झोला देखा। झोला नही ले गई। खोल कर देखा। सारे गहने, सारे कपड़े कुछ नही ले गई। ये फोटो भी नही ले गई। मैं तो ऐसे ही कहा था। छोड़कर चली गई। कुछ भी नही ले गई। मैं कैसे अकेले रहूंगा। मैने बहुत दिल दुखाया है उसका। दारू पी कर उसको बहुत मारा हूं। बेचारी कितनी सीधी है। कह कर रीना का पति फफक कर रो पड़ा। दहाड़े मार कर रो पड़ा।

तुरंत रीना के पास फोन किया। रीना तुम कहां हो। चली आओ। मैने तुम्हारा दिल बहुत दुखाया है। तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता हूं। मैं तुमसे वादा करता हूं। कभी दारू नही पियूंगा। तुम कीमती जेवरात की तरह हो। तुम्हारे रहने से इस घर में रौनक है। तुम चली जा रही हो। मेरे बारे में तनिक नही सोंचा। मैं कैसे रहूंगा। यह तुम्हारा घर है। रीना बोली.. हां यह मेरा घर है। पति बोला...जल्दी आ जाओ। मैं तुम्हारे लिए चाय बना रहा हूं।

‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज-कवि: विवेक कुमार मिश्र,समीक्षक व सौन्दर्यविद डॉ. रमेश चन्द मीणा सहायक आचार्य- चित्रकला राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा

 ‘इस तरह आदमी’: जीवन-सत्य की संवेदनात्मक खोज पुस्तक शीर्षक: इस तरह आदमी कवि: विवेक कुमार मिश्र विधा: कविता संग्रह प्रकाशन: वेरा प्रकाशन, जयप...