शनिवार, 20 जनवरी 2024

यात्राएं, आन्दोलन और प्रजातंत्र की आत्मा -राम पुनियानी


                                   प्रोफेसर राम पुनियानी

 यात्राएं, आन्दोलन और प्रजातंत्र की आत्मा  

-राम पुनियानी

आने वाली 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होना है. इसके लिए जिस स्तर पर व्यापक तैयारियां की जा रही हैं और इसमें भागीदारी के लिए जिस बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद किया जा रहा है, उसके चलते आज भारत के धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आत्मचिंतन जरूरी हो गया है.

स्वतंत्रता के तुरंत बाद यह मांग उठी कि गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिरजिसमें 11वीं सदी में महमूद गजनी ने तोड़फोड़ की थीका पुनर्निर्माण सरकार द्वारा करवाया जाए. जवाहरलाल नेहरू लिखते हैं कि वे और सरदार पटेल महात्मा गांधी से मिले और “इस विषय पर चर्चा की मगर गांधीजी का मत था कि सरकार को मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए धन उपलब्ध नहीं करवाना चाहिए और ना ही इस पर होने वाले खर्च में कोई हिस्सेदारी करनी चाहिए”. इसी तर्ज पर नेहरूजो उस समय देश के प्रधानमंत्री थेने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सलाह दी कि वे भारत के राष्ट्रपति की हैसियत से पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन न करें. और फिर नेहरू ने बांधोंसार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमोंस्वास्थ्य से जुड़ी संस्थाओं और शैक्षणिक व शोध संस्थानों को आधुनिक भारत के मंदिर निरूपित किया.

“एक व्यक्ति एक वोट” के सिद्धांत ने भी देश में प्रजातंत्र को मजबूती दी. श्रमिकोंकिसानों और समाज के अन्य तबकों के सामाजिक आंदोलनों से भी भारतीय प्रजातंत्र मजबूत हुआ. आपातकाल के कुछ सालों को यदि हम छोड़ दें तो हम पाएंगे कि स्वतंत्रता के बाद से भारत में प्रजातंत्र और मजबूतऔर गहरा होता गया. यह सिलसिला
राममंदिर आंदोलन शुरू होने तक चला. यह आंदोलन स्वाधीनता संग्राम से उपजे
  ‘भारत के विचार’ के खिलाफ था. बाबरी मस्जिद में योजनाबद्ध तरीके से रामलला की मूर्तियां रख दी गईं और फैजाबाद के तत्कालीन कलेक्टर के. के. नैयर ने उन्हें हटवाने से इंकार कर दिया. इससे ही उस मुद्दे की नींव पड़ी जो आगे चलकर भारतीय संविधान के मूल्यों के लिए एक बड़ा खतरा बनने वाला था.

छह दिसंबर 1992 को षड़यंत्रपूर्वक बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया और इससे उस भव्य मंदिर के निर्माण की राह प्रशस्त हुई जिसका इस महीने उद्घाटन होना है. जो राजनैतिक दल इस समय भारत की केन्द्र सरकार पर काबिज है वह न केवल भावनात्मक मुद्दों को अपनी राजनीति के केन्द्र में रखता आया है वरन् उसने भारत में प्रजातंत्र को सीमित और कमजोर भी किया है. लालकृष्ण आडवाणीजिन्होंने राममंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीवे भी यह कहने पर मजबूर हो गए कि भारत में वर्तमान में अघोषित आपातकाल लागू है. कुल मिलाकर भावनात्मक मुद्दों की रेलमपेल में प्रजातांत्रिक महत्वाकांक्षाओं और बेहतर जीवन स्तर हासिल करने की तमन्नाओं का गला घोंट दिया है. सरकार इन मुद्दों पर ध्यान देने को तैयार नहीं है और बढ़ती कीमतों और जीवनयापन में कठिनाईयों के चलते आम लोगों का जीना दूभर हो गया है.

एक अच्छे कल के सपने हवा हो गए हैं. भगतसिंहसुभाषचन्द्र बोसमहात्मा गांधी और भारत की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले असंख्य नेताओं ने जिस भारत के निर्माण का स्वप्न देखा थावह भारत कहीं नज़र नहीं आ रहा है.

इसके साथ ही यह भी सच है कि पिछले कुछ सालों में हमने भारतीय प्रजातंत्र की ताकत के कुछ उदाहरण भी देखे. कृषि क्षेत्र में दमनकारी कानून लागू करने के खिलाफ बड़ी संख्या में किसान दिल्ली पहुंचे. महीनों तक चले उनके संघर्ष में 600 किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी. उन्होंने यह साबित किया कि प्रजातांत्रिक आंदोलनों से सरकार को झुकाया जा सकता है. सरकार को कृषि कानून वापस लेने पड़े. उसके बाद सरकार ने एक और कपटपूर्ण चाल चली. मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) बनाया गया एवं राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) पर काम शुरू किया गया. इसकी प्रतिक्रियास्वरूप शाहीनबाग आंदोलन शुरू हुआ जिसने एक बार फिर यह साबित किया कि प्रजातांत्रिक आंदोलनों के जरिए देश का भविष्य गढ़ा जा सकता है.

लगभग एक साल पहले निकाली गई भारत जोड़ो यात्रा ने भी देश के लोगों के दुखों और परेशानियों को सामने लाने का काम किया. इस यात्रा से यह संदेश भी गया कि विभिन्न धर्मों को मानने वाले और विभिन्न जातियों में बंटे भारतीय मूलतः एक हैं. इस यात्रा से वातावरण में घुला अवसाद और निराशा का भाव कम हुआलोगों में आशा  का संचार हुआ और देश का ध्यान असली मुद्दों पर गया उन मुद्दों पर जिनका संबंध भूख सेसिर पर छत से और रोजगार से था. इस यात्रा पर जिस तरह की जनप्रतिक्रिया देखने को मिली उससे ऐसा लगा मानो लोग इस तरह के किसी आयोजन की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे. ऐसा लगा मानो वे प्रजातांत्रिक ढंग से अपने दुःखों और वंचनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए मौके की तलाश में थे. इस यात्रा ने राष्ट्रीय स्तर पर एक नया संवाद शुरू किया और ऐसी उम्मीद बंधी की हम एक समावेशी समाज का निर्माण कर पाएंगे और अपने लोगों की दुनियावी आवश्यकताओं को पूरा कर सकेंगे.

इन सब चीजों से फर्क तो पड़ा परंतु साम्प्रदायिक ताकतों की मशीनरी इतनी कार्यकुशलइतनी विशाल और इतनी शक्तिशाली है कि उसने जल्द ही एक बार फिर ऐसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के केन्द्र में ला दिया जो देश को बांटने वाले थे और जिनका लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं से कोई लेनादेना नहीं था. राममंदिर के उद्घाटन को बहुत बड़ी घटना बताया जा रहा है. संघ के सभी अनुषांगिक संगठन इस आयोजन के लिए लोगों को गोलबंद करने में दिन-रात जुटे हुए हैं. लोगों को अक्षत बांटकर अयोध्या आने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. अयोध्या जाने के लिए विशेष ट्रेनें और बसें चलाई जानी हैं. देश का पूरा ध्यान राम मंदिर के उद्घाटन पर केद्रित हो गया है.

पूरा देश 22 जनवरी का इंतजार कर रहा हैजिस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति में प्राण फूंकेगें. इस सबके बीच एक दूसरा आयोजन भी चल रहा है. 14 जनवरी को मणिपुर से भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू हुई है जो 20 मार्च को मुंबई पहुंचेगी. यह यात्रा हाईब्रिड है, अर्थात कुछ दूरी बस से तय की जाएगी और कुछ पैदल. यह यात्रा मणिपुर से शुरू हुई हैजहां पिछले सात महीने से नस्लीय हिंसा जारी है मगर सरकार उस पर कोई ध्यान नहीं दे रही है. मणिपुर में यात्रा की शुरूआत में उसे लोगों की सकारात्मक प्रतिक्रिया हासिल हुई.

इस यात्रा का फोकस न्याय पर है. हम आज अपने चारों ओर अन्याय देख रहे हैं. यात्रा का फोकस बेरोजगारीकिसानों की समस्याओंबढ़ती गरीबी और आदिवासियों के हकों और महिलाओं की गरिमा पर बढ़ते हमलों पर है. प्रजातांत्रिक ढंग से आम लोगों की समस्याओं को देश के सामने लाने का शायद यह एक बेहतर तरीका है. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा केवल और केवल राम मंदिर के उद्घाटन की चर्चा कर रहा है. ऐसे में इस यात्रा के संदेश को चारों ओर फैलाना जरूरी है. राममंदिर भाजपा-आरएसएस का एजेंडा है और यह साम्प्रदायिक और निरंकुश राजनीति को बढ़ावा देगा. भारत जोड़ो न्याय यात्रा के केन्द्र में संवैधानिक नैतिकता से जुड़े मुद्दे हैं. इस यात्रा को किसी एक पार्टी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. यह समाज के विभिन्न तबकों की आवश्यकताओं और अधिकारों की अभिव्यक्ति है. यह उन लोगों का असली चेहरा दिखाने का प्रयास है जो समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत कर देना चाहते हैं और जो समावेशी भारत के स्थान पर हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं.

भारत में अतीत से ही यात्राएं समावेशी मूल्यों को संरक्षण और अपने संदेश के व्यापक प्रसार का माध्यम रही हैं. आजजब वैचारिक प्रचार-प्रसार और राजनैतिक मूल्यों से संबंधित पूरे तंत्र पर एक पश्यगामी राजनैतिक गठबंधन का नियंत्रण है तब न्याय के लिए यात्रा ताजा हवा के एक झोंके जैसी है. ऐसा लगता है कि कोई एक बार फिर भारतीय राष्ट्रवाद की लौ प्रज्जवलित करना चाहता है. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनियालेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं) 

 

 

कहीं नहीं पहुँचती प्रार्थनाएं- श्रद्धा सुनील (साहित्यकार एवं संगीतकार)


 

हाँ

मैने विस्मृत कर दिया

अपनी स्मृतियों से प्रेम और सहेज समेट लिया स्वयं को

मन की कन्दरा में ।

बादलों में उन्मुक्त उड़ रही अनुभूतियों को लौटा लिया  अंतस की मंजूषा में ।

बारिश की नन्हीं बूंदों को बहला दिया  कह कर कि

नहीं भीग सकूँगी

तुम लौट जाओ अपने आकाश में

खिला था मोगरा स्वपनिल स्वर माधुर्य में

पर कंठ मे उसे  उतरने नहीं दिया

कुछ जुगन जगमगाए थे अँधेरी रात  में

कुछ झींगुर भी खनके थे भैरवी की तर्ज पर

लेकिन

सबको अनसुना किया क्योंकि जान चुकी हूँ

यह सब महज दिवास्व्प्न हैं

कहीं नहीं पहुँचती प्रार्थनाएं सब  एकलाप हैं

 कुछ प्रतिभाएँ  बुध्दि कौशल में निष्णात

कवि जन्म होते हैं सिर्फ़ प्रेम की कविताएँ लिखने के लिए और

कुछ ह्रदय

सिर्फ़ प्रेम के लिए जन्म लेते हैं

प्रेम में  होना और प्रेम की कविता करना

दो भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हो सकती हैं ।।

गुरुदेव रवींद्रनाथ की एक कविता - बांग्ला से अनुवाद: डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन


 गुरुदेव रवींद्रनाथ की एक कविता


जहांँ चित्‍त भय से शून्‍य हो 
जहांँ हम गर्व से
माथा ऊंँचा करके चल सकें

जहांँ ज्ञान मुक्‍त हो 
जहांँ दिन रात
विशाल वसुधा को 
खंडों में विभाजित कर 
छोटे छोटे आंँगन
न बनाए जाते हों 

जहांँ हर वाक्‍य
हृदय की गहराई से
निकलता हो

जहांँ हर दिशा में
कर्म के अजस्‍त्र नदी के
 स्रोत फूटते हों
और निरंतर
अबाधित बहते हों 

जहांँ विचारों की सरिता 
तुच्‍छ आचारों की मरुभूमि में 
 न खो जाती हो

जहांँ पुरुषार्थ
सौ सौ टुकड़ों में
बंँटा हुआ न हो 

जहांँ पर सभी कर्म
भावनाएंँ, आनंदानुभूतियाँ
 तुम्‍हारे अनुगत हों

हे पिता!
अपने हाथों से
निर्दयता पूर्ण प्रहार कर
उसी स्‍वातंत्र्य स्‍वर्ग में 
इस सोते हुए भारत को जगाओ!

बांग्ला से अनुवाद: 
डॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन

1-उम्मीद 2- छूमंतर आलोक कुमार मिश्रा


 

 उम्मीद

तुमसे मिलकर जाना ये मैंने 

कि दुनिया को बहुत ज़रूरत है 

तुम्हारी सी हंसी की

तुम्हारी सी छुवन की

तुम्हारी सी नमी की

नथुनों में घुलते बारूदी गंध

बरसते बमों की डरावनी आवाज़

और पसरती हिंसा के बीच

ये जो सिमटी हो तुम ख़ुद में

तो सुनो

 एक दिन

तुम्हारे आंसुओं से अंकुराएगी फिर ये धरती

मची भगदड़ के बीच एक फूल के लिए हुलसती

तुम्हारी गोद में ये जो बच्ची है

अंततः बचाएगी वही 

उम्मीदों के प्राण।



 छूमंतर-


हम गावों से आए हुए लोग थे

पहेली था शहर हमारे लिए

एक ऐसी पहेली 

जिसे हम डरते थे सुलझाने से

हिचकते थे उलझने से

कतराते थे इसे हाथ लगाने से

दिल लगाना तो दूर की बात थी

 शहर में हम फुसफुसाते थे अपनी भाषा में

पर जवाब में बोलते थे उसी की भाषा

कई बार हम हंसी थे तो कई बार ज़िल्लत

गंवार तो थे ही हम

पर बुरा तब लगता था जब कुछ भी नहीं होते थे

इंसान भी नहीं

शहर क्रूर था हमारे लिए

घड़ी में बजे नौ से नौ के बीच वाले समय में

रगड़ता था हमें 

और बदले में देता था गुजारे भर रूपया

अंजुरी भर नींद

मुठ्ठी भर सपना

चुटकी भर उम्मीद

और रात के अंधेरे बराबर याद

बदले में हम शहर को देते थे

समुद्र भर पसीना

आकाश भर अपना मन अनमना

हमारी हथेलियों से फूटती थी उसकी सारी जगमग 

हमारी आंखों में दिखती थी उसकी पूरी निस्सारता

शहर से मिला सब कुछ बटोरते थे हम अपने खीसे में

और एक दिन हो जाते थे छूमंतर

या तो शहर के बाहर

या फिर शहर के भीतर।

 

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

सच को नकारते हुए- शालू शुक्ला

सच को नकारते हुए

आये दिन सच को चकमा देते हुए वह

बुनता है झूठ के ताने बाने से घटनाओं का जाल

उसी जाल में फंसा हुआ कराहता रहता है मेरा अतीत

फड़फड़ा रहा है मेरा वर्तमान

लहूलुहान हो गया है बच्चों का भविष्य

बूढ़ी हो चली है मेरी उम्मीद और किस्मत

सहारे के लिए कोई लाठी भी नहीं है

पैरों में अब कोई जान नही रही

उम्मीद और किस्मत झुर्रियो से घिरकर बदसूरत हो गई है

अब कुछ भी सही नहीं होगा यह जानते हुए भी मै

बूढ़ी उम्मीद को  बताती हूं जवान होने के नुस्खे

और किस्मत को पढाती हूं सर्वाद्धसिद्धि के मन्त्र

विश्वास दिलाती रहती हूं सब-कुछ ठीक हो जाने का

इस तरह एक ही घर में अलग अलग हम जी रहे है झूठ की जिंदगी

सच को चकमा  देते हुए !!

 

कहानी-फ़ांस -आशा पाण्डेय (कवयित्री,कथाकार और लेखिका )


                                                                             फ़ांस

              दिसम्बर महीने के शुरुवाती दिनों की ये रात ठंड में काँप रही है | रात ढाई बजे ट्रेन से बाहर निकलते ही हवा का एक झोंका हड्डियों के भीतर तक उतर कर हमारा स्वागत किया | लपेटी हुई शाल को और कसते हुए हम लोग स्टेशन से बाहर निकलने के लिए सीढ़ियाँ उतर रहे हैं | ऑटो,जीप रिक्शेवाले हमारी ओर उम्मीद से देखते हुए आगे बढ़ते हैं,लेकिन ‘गोविंदपुर’ का नाम सुनते ही उदासीन होकर पीछे हो जाते हैं | इतनी रात में, इतनी ठंड में, इतनी दूर ... शायद नहीं जाना चाहते |

     पीछे की पंक्ति के कुछ ऑटो ड्राइवर हमें आवाज दे रहे हैं, किंतु पति एक रिक्शेवान से बात करने लगे | वो चलने को तैयार है |

    ‘बहुत दिनों से साइकिल रिक्शे पर नहीं बैठे हैं, चलो रिक्शे से ही चलते हैं |’

    ‘ इतनी रात को ! ... ठीक रहेगा ?’ मेरे मन में शंका उठती है | पति सिर झटक कर मेरी शंका को निर्मूल सिद्ध कर देते हैं | इस बीच रिक्शेवान एक और रिक्शे को बुलाकर हमारे सामने खड़ा कर देता है |       

 ‘लालच बुरी बला है बिटिया,किसी काम की नहीं होती | जिसको लग गई, समझो उसको खा गई |’

        रिक्शावान रिक्शे पर सामान लादता जा रहा है, बोलता जा रहा है |

‘किशोर बढ़ा आगे ...बाबू जी तुम बेबी के साथ उस रिक्शे पर बैठ जाओ और बिटिया तुम मुन्ना के साथ मेरे रिक्शे पर आ  जाओ |’

       मुन्ना और बेबी ! कितना आत्मीय नामकरण ! और मुझे भी अपनी बिटिया बना लिया | मन प्रेम का कितना भूखा होता है ! इस आत्मीय संबोधन मात्र से मेरा हृदय अंदर तक भीग गया | कितने गहरे रिश्ते जोड़ लिए इस रिक्शेवान ने ! मेरे ऊपर इस रिश्ते की मिठास का नशा चढ़ना शुरू हो गया है,किंतु इसमें पूरी तरह डूबने के पहले ही मैं सम्भल जाती हूँ | अब तक के अनुभवों ने सिखा दिये हैं मुझे कि ये रिश्ते पल भर के लिए भी नहीं टिकते | बस, इनकी डोर पकड़ कर बेवकूफ बनाने के लिए गढ़े जाते हैं ये | क्या मेरे साथ ही इस रिक्शेवान को इतनी आत्मीयता हो गई ! नहीं, ये आत्मीयता नहीं  है | रोज मुझ जैसी तमाम सवारियां इसके लिए मुन्ना, बेबी, बिट्टन और बिटिया बनती होंगी | इन रिश्तों की गहराई से इसे कुछ भी लेना देना नहीं है, ये सवारियों को प्रभावित करने का तरीका मात्र है, बस |

       मेरे मन मे एकदम से उमड़ आये मधुर भाव बिला गए हैं अब और दिमाग में संदेह का कीड़ा घुसने लगा है | मैं अपना सामान गिनती हूँ | एक बार, दो बार, तीन बार -  जितने सामान लेकर चली थी, सब हैं, पर लग रहा है जैसे कुछ गायब हो गया है, कुछ छूट गया है | पति से कहती हूँ, वे भी गिनते हैं | सारे सूटकेस, बैग-  सब है | मैं आश्वस्त होती हूँ | रात के तीन बज रहे हैं | रिक्शे पर बैठने के पूर्व मेरे पति ने दोनों रिक्शेवान को हिदायत दी कि वे साथ-साथ ही चलें |ही

       ‘चिंता मत करो बाबू जी, हम साथ-साथ ही चलेंगे | ... अरे वो किशोर, आगे पीछे ही चलना | इ ... ठीक से बैठ जाओ बिटिया, डरो नहीं | रिक्शा चलाते-चलाते पूरी उमर निकल गई, गिराऊंगा नहीं | धीरे-धीरे ही चलूँगा |’      

       मन में आया कह दूँ -  क्यों डरूँगी ? रिक्शे से डर ! इसी रिक्शे से तो इस शहर का चप्पा-चप्पा घूमी हूँ | तुम्हारे इस रिक्शे पर बैठते ही तो मैं वर्षों पहले के इलाहाबाद में पहुंच गई हूँ | कहना ये  भी चाह रही हूँ कि कुछ भी तो नहीं बदला है इलाहाबाद में | माँ की गोद जैसा हमेशा एक-सा ठंडक देने वाला ये शहर, किंतु रिक्शेवान से अधिक बात करना भी उचित नहीं लग रहा है | चुपचाप बैठी रह जाती हूँ |

         ‘लगता है बहुत दिनों बाद अपने शहर में आई हो बिटिया,’ रिक्शेवान पूछता है |

         ‘हाँ, पांच साल बाद |’ मैं अनमने मन से जवाब देती हूँ |

         ‘ अब बताओ भला, तुम लोग अपने शहर में इतने दिन बाद आये हो और बाबूजी हैं कि किराये का मोल-भाव करने लगे  ... मेरा भी कुछ फर्ज बनता है बिटिया | में ज्यादा पैसे क्यों लूँगा ? जो समझना, सो दे देना | ...अब महंगाई की मार तो देख ही रही हो बिटिया,|’ मैं मन ही मन मुस्कुराती हूँ | रिक्शेवान अधिक पैसा वसूलने की भूमिका बना रहा है | कितने चालाक होते हैं ये लोग !! पहले अपनी बातों में उलझा लेते हैं फिर रिश्ता जोड़ लेते हैं | बस, सवारियां फंस जाती हैं इनकी बातों में, किराया तय नहीं करती | उसका फायदा उठाकर ये बाद में अधिक पैसा ऐठने की कोशिश करते हैं | ...अब किया ही क्या जा सकता है, बैठ तो हम लोग भी गए हैं रिक्शे पर | उतरने पर पता नहीं ये कितने पैसे मांगेगा और कितनी देर तक बहस करेगा |

          दिसम्बर महीने के शुरुवाती दिन और रात का समय ! ठंड तेज पड़ रही है | नगरपालिका एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा रास्ते में जगह-जगह अलाव जल रहे | गरीब, मजदूर रिक्शेवान अलाव को चारो ओर से घेर कर आग तप रहे हैं |

        मेरा रिक्शेवान भी अलाव के पास दो मिनट रुककर अपने हाथों को सेंक लेना चाहता है | उसके दोनों हाथों की हथेलियाँ तथा उँगलियाँ रिक्शे की हैंडिल पकड़े –पकड़े अब तक ऐठ-सी गई हैं | रिक्शेवान की माने तो उसे समझ में ही नहीं आ रहा है कि उसने रिक्शे की हैंडिल पकड़ी है या नहीं | ठंड के मारे सुन्न पड़ गए हैं उसके हाथ |

       पति ने कहा , ‘पहले हमें पहुँचा दो यार,लौटते समय सेंक लेना हाथ |’   

         हम किसी प्रकार का खतरा मोल लेना नहीं चाहते | इन आग तापते लोगों के साथ मिलकर ये रिक्शेवान हमें नुकसान भी तो पहुँचा सकता है | ...इन लोगों का क्या भरोसा !

        हाथ सेंकने से मना कर देने पर रिक्शेवान मन मसोस कर रह गया | रिक्शे की पैडिल पर अब उसके पैरों की गति अब कुछ तेज हो गई है | रिक्शा चलाते-चलाते ही उसने कान में लपेटे मफलर को और कस लिया तथा अपना बांया हाथ कोट की जेब में डाल लिया |

        कोट कई जगह से फट गई है, फटी जगह में दूसरे कपड़े का पैबंद लगाकर कोट को पहनने लायक बना लिया है | थोड़ी देर बाद उसने अपने बांये हाथ को कोट की जेब से निकाल कर उससे रिक्शे की हैंडिल पकड लिया तथा दायें हाथ को कोट की जेब में डाल लिया | ...हर थोड़ी-थोड़ी देर में अब वो हाथ बदल-बदल कर कोट की जेब में डाल रहा है |

       मैं उसे टोकती हूँ, ‘ दोनों हाथ से हैंडल पकड़कर ठीक से चलाओ, देख नहीं रहे हो कितने गड्ढे हैं सड़क पर  | ... रिक्शा कहीं उलट-पलट गया तो आफत हो जाएगी |’

      ‘कुछ नहीं होगा बिटिया,तुम दरो मत |’

      ‘मैं डर नहीं रही हूँ, बस तुम दोनों हाथ से हैंडिल पकड़ कर ठीक से चलाओ रिक्शा | मुझे तुम्हारा स्टंट नहीं देखना है |’ बिलकुल सपाट और तीखे शब्द हैं मेरे |

       रिक्शेवान स्टंट का मतलब समझ पाया या नहीं, किंतु जेब से हाथ निकाल कर दोनों हाथ से हैंडिल संभाल लिया | मेरी चिंता कम हुई |

       यूँ तो हम लोग गरम कपड़ों से लड़े हैं | यहाँ तक कि हमारे हाथ-पैर की उँगलियाँ भी दस्तानों और मोजो से ढकी हुई हैं, किंतु ठंड है कि रास्ता बनाते हुए हमारी हड्डियों तक में घुसी आ रही है | ठंड से ध्यान हटाने के लिए मैं सड़क किनारे की दुकानों और मकानों को देखने लगी हूँ |

       कुछ इमारतें पुरानी किसी न किसी याद को ताजा कर रहीं हैं |

कम्पनीबाग से आगे बढ़ रहे हैं हम | बाई तरफ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की इमारतें खड़ी हैं | गोल गुम्बद वाली ऊंची बिल्डिंग – यहीं तो हुई थी मेरी बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा | अर्थशास्त्र का पेपर था| गुम्बद के ठीक नीचे मेरी सीट थी | जब मेरे सर पर कुछ गीला-गीला गिरा तो मैं चौंक गई | ऊपर देखने के लिए सर उठा ही रही थी किटेबल पर भी टप की आवाज करता हुआ कुछ टपक पड़ा | यह कबूतरों का कमाल था | मेरी उत्तरपुस्तिका सुरक्षित थी इसलिए मैंने भगवान को धन्यवाद दिया | मात्र पन्द्रह मिनट बचे थे, मैंने बेवश नजरों से कबूतरों को देखा और तेज रफ़्तार से लिखने में जुट गई | उत्तरपुस्तिका जमा कर बाहर निकली तो हमारे कालेज का चपरासी शिवचरण दिखाई दिया | उसको मैंने सारी बातें बताकर अपना सिर दिखाया, मुस्कुराते हुए उसने बाहर रखे मटके से एक जग पानी लाया,उससे मैंने अपने सिर को साफ किया |

         इस घटना की याद ने इतनी ठंड में भी एक स्फूर्ति-सी भर दी मन में | रिक्शा आगे बढ़ रहा है और मैं पीछे यादों में लौट रही हूँ |

         कटरा की सब्जी मंडी पीछे छूट रही है | अब आगे लगभग दो किलोमीटर का रास्ता एकदम सूना है | दूसरा रिक्शा,जिस पर मेरे पति बैठे हैं वह भी साथ ही साथ चल रहा है, जब वह रिक्शा एकदम मेरे नजदीक हुआ तो मैंने धीरे से कहा, ‘बहुत बड़ी भूल हुई | ऑटो रिक्शा या जीप से आना चाहिए था | साइकिल रिक्शे पर बैठने का शौक कहीं मंहगा न पड़ जाये |’

         मेरी चिंता को सुनकर रिक्शेवान ने कहा, ‘बिटिया, डरो मत | पहले हमें कुछ होगा तब तुम लोगों पर आँच आयेगी | बस, भगवान का नाम लेती रहो |’

        पति ने घड़ी देखकर कहा, ‘अब चार बज गए हैं, डरने की कोई बात नहीं है |’

        थोड़ी देर बाद हम सुनसान रास्ते को पीछे छोड़ते हुए अपट्रान के सामने पहुंच गए | कुछ दूर चढ़ाई है | रिक्शेवान सीट से उतर कर रिक्शा खींचते हुए पैदल चलने लगा | मैं रिक्शे से उतरना चाहती हूँ,जिससे उसकी मेहनत कम हो जाये,पर रिक्शेवान मुझे उतरने नहीं दिया, बोला, ‘ दो मिनट की तो बात है बिटिया, अधिक दूर तक चढ़ाई नहीं है | हम लोगों की तो आदत पड़ गई है रिक्शा खींचने की | चाहे पैडल मार कर खींचूँ,चाहे पैदल चल कर |’

        बस, पांच मिनट का रास्ता और घर आ गया | रिक्शेवान दोनों रिक्शे का मात्र दो सौ रुपये ही लिया | मुझे लग रहा है कि उचित किराये से भी कम लिया है शायद | मैं नाहक इसके बारे में अनाप-शनाप सोच रही थी | मन ही मन मुझे कुछ ग्लानि हुई, किंतु अधिक देर तक मैंने इस  विचार को अपने दिल पर लदने नहीं दिया | गुंजाइश भी नहीं है, क्योंकि घर का दरवाजा खुल गया है | हम एक दूसरे से गले लगे , खुश हुए और किराये की बात भूल गए |

        कुछ देर बाद फिर से दरवाजा खटका |  पति ने दरवाजा खोलकर देखा तो सामने वही रिक्शेवान मेरी सूटकेस लिए खड़ा है, बाबूजी ये लीजिये आपका बक्सा, सामान उतारते समय इसपर ध्यान ही नहीं गया | सीट के पीछे रख दिये थे न ... इंजीनियरिंग कालेज के सामने एक सवारी बैठाने लगा तब मेरा ध्यान इस बक्से पर गया | सवारी को मना कर मैं बक्सा देने आ गया |’

      हम सब अवाक् | पति ने उसकी ईमानदारी की प्रशंसा करते हुए सूटकेस ले लिया | रिक्शेवान चला गया | उस सूटकेस में कपड़े-लत्ते के अलावा कुछ पैसे भी रखे थे | रिक्शेवान के लिए ये बड़ी रकम होती | सूटकेस से कुछ ऊनी कपड़े उसे मिलते जो इस सर्दी में बहुत उपयोगी होते,लेकिन बिना किसी लालच में पड़े, मिली हुई सवारी को भी छोड़कर यहाँ तक दौड़ा आया सूटकेस लौटाने !!

      घर में सब लोग रिक्शेवान की ईमानदारी पर दो-तीन मिनट बात करके फिर से हंसी- मजाक में लग गए | बात तो मैं भी सबके साथ कर रही हूँ पर मेरा उत्साह अब समाप्त हो गया है | रास्ते भर मैं इस रिक्शेवान को शंकालु नजर से देखती रही | इसकी सीधी-सादी बातों में भी चालाकी खोजती रही | अब,जब वह सूटकेस लौटाकर चला गया तो जी कर रहा है कि उसकी अपनत्व भरी बातों का प्रेम से जवाब दे दूँ | कह दूँ कि, ‘काका हम पांच मिनट रुके रहेंगे,तुम ठंड में अकड़ गए अपने हाथों को सेंक लो| अपट्रान की चढ़ाई पर उसके मना करने के बाद भी उतार जाऊं और कह दूँ कि अब तुम्हारी उमर नहीं रही कि सवारियों को बैठा कर चढ़ाई पर रिक्शा खींचो | या फिर किराये के रूप में कुछ अधिक पैसा देकर कह दूँ कि फ़र्ज सिर्फ तुम्हारा ही नहीं है काका,मेरा भी है | इन पैसों को रख लो | ये किराया नहीं है बेटी का प्रेम है |

   बेटी का प्रेम !

   रिक्शेवान के बार-बार बिटिया कहने पर भी जो नहीं उमड़ा !!          

  प्रेम भरे शब्दों को जमा दे, इतनी ठंड तो नहीं है इस शहर में !!

 ‘बेटी’ शब्द फ़ांस- सा अटक गया है गले में |

 

                                     

लाल किले की प्राचीर से भी बिस्मिल की शायरी ने दिया था मोहब्बत का पैगाम - एम.असलम. टोंक


 लाल किले की प्राचीर से भी बिस्मिल की शायरी ने दिया था 
मोहब्बत का पैगाम

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एम.असलम. टोंक

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 "सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते, हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते, कहते हैं मोहब्बत फ़क़त उस हाल को 'बिस्मिल' जिस हाल को हम उन से भी अक्सर नहीं कहते..।

हां, ये शायरी देश के नामवर शायर रहे बिस्मिल सईदी की हैं। जिनके बिना एक ज़माने में राष्ट्रीय पर्व पर आयोजित लाल किले का मुशायरा भी फीका माना जाता था। बिस्मिल सईदी मुशायरे का संचालन के साथ ही अपने कलाम के ज़रिए अपने शीरीं लहजे के साथ मुहब्बत की खुशबूं जिस अंदाज से बिखेरा करते थे, वो काबिले तारीफ था। जिसपर राजस्थान की सरजमीं आज भी फख्र करती है। देश के नामवर शायर मख़मूर सईदी भी उनके शार्गिद रहे। 

 "हमने कांटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर,

लोग बेदर्द है फूलों को मसल देते हैं।

 टोंक की सरजमीं पर 6 जनवरी 1902 में पैदा हुए सैयद ईसा मियां तखल्लुस बिस्मिल सईदी को शायरी का फन विरासत में मिला था। उनके वालिद उर्दू, अरबी व फारसी के कवि होने के साथ ही नामवर हकीम भी थे। बताया जाता है कि उर्दू और फारसी की प्राथमिक शिक्षा बिस्मिल सईदी ने घर पर ही हांसिल की। 1920 में अलीगढ यूपी गए, वहां अंग्रेजी एवं फारसी की कुछ किताबें पढ़ीं। उन्होंने भी तिब की तालीम हांसिल की। उनकी बेबाकी एवं स्वतंत्र स्वभाव कई बार उनके लिए परेशानी का भी सबब बना।

"खुशबू को फैलने का बहुत शौक है मगर

मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किए बगैर।'

बिस्मिल सईदी 1939 में टोंक से दिल्ली गए तथा वहां पर उनकी शायरी परवान चढी। 1946 से बिस्मिल स्थायी रूप से दिल्ली में रहने लगे। उन्होंने जाम टोंकी एवं सीमाब अकबराबादी से भी इस्लाह ली। दिल्ली से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “बीसवीं सदी” से भी वह जुड़े. उन्हें ग़ालिब और नेहरू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। राजस्थान उर्दू अकादमी द्वारा भी उनके नाम से अवार्ड दिया जाता है।

"कब से उलझ रहे हैं दम-ए-वापसीं से हम,

दो अश्क पोंछने को तिरी आस्तीं से हम।

दोहराई जा सकेगी न अब दास्तान-ए-इश्क़,

कुछ वो कहीं से भूल गए हैं कहीं से हम ।

उनके कलाम के चार संग्रह निशाते ग़म, कैफे अलम, मुशाहदात और औराक़े ज़िन्दगी प्रकाशित हो गए हुए। उनका पूरा काम ‘कुल्लियाते बिस्मिल सईदी’ शीर्षक से साहित्य अकादमी द्वारा 2007 में प्रकाशित किया गया। विश्व प्रसिद्ध अरबी-फारसी शोध संस्थान ने भी एक पुस्तक प्रकाशित की है। बिस्मिल का 26 अगस्त 1977 को दिल्ली में इंतेक़ाल हो गया। वो इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो गए। उनके बारे में पुस्तक शान-ए-बनास भाग प्रथम में भी जानकारी समाहित की गई।

 "बैठा नहीं हूँ साया-ए-दीवार देख कर,

ठहरा हुआ हूँ वक़्त की रफ़्तार देख कर,

"बिस्मिल तुम आज रोते हो अंजामे इश्क को,

हम कल समझ गए थे कुछ आसार देखकर।'

बैठा नहीं हूँ साया-ए-दीवार देख कर,

ठहरा हुआ हूँ वक़्त की रफ़्तार देख कर,

"बिस्मिल तुम आज रोते हो अंजामे इश्क को,

हम कल समझ गए थे कुछ आसार देखकर।'

1975 में जब टोंक में प्रियदर्शी ठाकुर कलेक्टर थे, उस समय बिस्मिल की शायरी सुनकर प्रियदर्शन ठाकुर शायर हो गए तथा एक कवि सम्मेलन में महाकवि नीरज भी उनका कलाम सुनकर दाद देते नजर आए। वो ग़ज़ल के शायर थे तथा उन्होंने शायरी की हर विधा में लिखा।

"जमाना आंख से मुझको गिरा के भूल गया,

इक अश्क था मैं जमाने की चश्मे तर के लिए।'

बिस्मिल साहब मोहब्बत के शायर थे। उनकी शायरी आज भी मोहब्बत का पैगाम देती हैं।

"हवस की दुनिया में रहने वालो को मैं मोहब्बत सीखा रहा हूं।

जहां पे दामन बिछे हुए हैं वहां पे आँखें बिछा रहा हूं।

अदम के तारीक रास्ते में कोई मुसाफ़िर न राह भूले,

मैं शम्मे हस्ती बुझा के अपनी चराग़े दिलबर जला रहा हूं।-