रविवार, 21 जनवरी 2024

|| उत्तर दिसि सरयू बह पावन || ( एक दशक पूर्व का यात्रावृत्त)- डॉ.जितेन्द्र पाण्डेय


                                                    || उत्तर दिसि सरयू बह पावन ||

( एक दशक पूर्व का यात्रावृत्त)

        अलसुबह बारिश की बूंदा-बांदी ने सरयू-तट को गीला कर दिया था।असावधानी से चलने के कारण कई श्रद्धालु फिसल-फिसल कर गिर रहे थे।सधे हुए कदमों से भी आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा था।किसी प्रकार नदी में प्रवेश किया।पानी का बहाव इतना कि पैर एक जगह टिकते ही नहीं।कमर तक पानी में डुबकी लगाकर बाहर निकल आया।ठंडी हवाओं ने बदन में कंपकंपी - सी पैदा कर दी।सतत प्रवाहमान सरयू जी के लिए अंतःकरण से सदिच्छाएं फूटने लगीं।सरस सलिला का सौम्य विस्तार देखकर गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति अनायास जिह्वा पर आ गई- "उत्तर दिसि सरयू बह पावन"।सरयू जी को प्रणाम करके अयोध्या की तरफ अभिमुख हुआ।मन में रामलला के बचपन का बिम्ब उभरने लगा।घुटनों के बल चलते चारों भाई , पैजनियों की रुन-झुन , माताओं का अगाध स्नेह , चौथेपन में राजा दशरथ का पुत्र-मोह आदि चित्रवत मानसपटल पर फिरने लगा।रामचरितमानस की पूरी कथा असम्बद्ध रूप से स्मरण हो आई।

              स्नानादि के बाद राम की पैड़ी से होते हुए हम हनुमानगढ़ी की ओर बढ़ने लगे।सहयात्री अपने ही थे।यशवंत जी ने बताया -"पाण्डेयजी,आप हर जगह घरों में एक छोटा-सा मंदिर पाएंगे लेकिन अयोध्या में आपको मंदिरों में घर मिलेंगे।यहां के महंत ? बाप रे बाप ! किसी राजे-महाराजे से कम नहीं।छप्पन व्यंजनों का छककर भोग लगाते हैं।बिल्कुल वीआईपी कल्चर।विना पूर्व अनुमति के आप उनका दर्शन नहीं कर सकते।चौबीसों घंटे सीसीटीवी की निगरानी।" कार की स्टेयरिंग को तेजी से घुमाते हुए संतोष सिंह ने चुटकी ली - कहिए ज़नाब , गाड़ी हनुमानगढ़ी के बजाय अखाड़ों की तरफ मोडूं?" "न न संतोष जी , महंत-दर्शन फिर कभी।फ़िलहाल हनुमंतलाल का दर्शन कराइए।"अखाड़ों को देखने की प्रबल इच्छा को दबाते हुए मैंने निवेदन किया।मंदिरों में दर्शन की प्रक्रिया आरम्भ हुई।चंद चढ़ावे की कीमत पर दुनिया के सारे सुखों को बटोर लेने की प्रार्थना में सभी तल्लीन हो गए।मंदिर-दर-मंदिर मत्था टेकते , मनौती करते , कुछ बुदबुदाते और आगे बढ़ जाते। कदम-कदम पर क्षण-विशेष को कैमरे में कैद करने की ज़द्दोज़हद मेरी कमजोरी है।हनुमानगढ़ी में क्लिक करते समय पता चला कि संतों की सशस्त्र सेना यहीं रहती है।बताया गया जब भी अयोध्या पर आक्रमण हुए संत-सेना नने वीरता से मुकाबला किया।अयोध्या की गलियों में चलते हुए भारतीय संस्कृति की अक्षुण्य विरासत यत्र-तत्र बिखरी मिली।कहीं प्रभावशाली उपस्थिति के साथ तो कहीं 'कुछ शेष चिह्न हैं केवल , मेरे उस महामिलन' के रूप में।अपनी परत-दर-परत में अयोध्या की धरती ने आर्यों के वैभवशाली इतिहास को बड़ी सावधानी से छिपा रखा है।इतिहास का वृहत् कालखंड सर्वत्र करवट-सा लेता प्रतीत हुआ।

                  अयोध्या में बंदरों का आतंक सर्वविदित है।उनकी नज़र भक्तों के हाथों से लटकती हुई थैलियों पर बनी रहती है।झपट्टा मारते और पलक झपकते ही प्रसाद की थैली उनके हाथ में।हमें भी उनके आतंक का शिकार होना पड़ा।प्रसाद-मोह छोड़ हम रामजन्म भूमि की ओर बढ़ चले।चाक-चौबंद सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी अपनी मर्ज़ी से पंख न फड़फड़ा सके।सुरक्षा घेरों में प्रवेश करने से पहले मोबाइल,पर्स,कैमरा,बेल्ट,कंघी आदि सिक्योरिटी में जमा करना पड़ा।कमांडों के अलग-अलग दस्ते सभी चौकियों पर तैनात थे।सघन जाँच का सिलसिला शुरू हुआ।तीन फीट चौड़े और आठ फीट ऊँचे लौह-जाल से होकर एक किलोमीटर से अधिक की यात्रा करनी थी।हर मोड़ पर जाँच।सुरक्षा का इतना पुख्ता इंतजाम मन को कचोटने लगा।एक ऐसे महापुरुष के जन्मस्थली को विवादास्पद बनाना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है जिसने सभी आदर्शों को जिया।वह एक संप्रदाय विशेष से कैसे हो सकता है ? 'निर्मल-मन' की शर्त रखने वाले प्रभु राम की जन्मभूमि तो सांस्कृतिक धरोहर के रूप में समस्त देशवासियों को स्वीकार करनी चाहिए।भारत की समृद्ध परम्परा की खूबसूरती की विकृति देखकर मन बोझिल हो गया।मानवता के पोषक रामलला को तिरपाल के नीचे पाकर भारतीय राजनीति का स्याह चेहरा भी सामने आया।इंसान को मज़हबों में बांटकर उनमें घृणा और अविश्वास पैदा करना सत्ता-सुख के लिए अनिवार्य शर्त-सी बनती जा रही है।सही है-" राजनीति देवकन्या नहीं बल्कि विषकन्या की आत्मजा है।"मर्यादापुरुषोत्तम सहित राम दरबार के सामने हाथ जुड़े और नेत्र सजल हो आए।तभी भक्तों का एक रेला आया और हठात् सुरक्षा रास्ते से बाहर कर दिया गया।

                     चिलचिलाती धूप में एक लम्बा चक्कर लगाकर हमारी टोली प्रसाद,फोटो,माला,सिन्दूर,चूड़ी,खिलौने आदि खरीदने में व्यस्त हो गई।लोगों की आस्था एवं भावनाओं को भुनाते दुकानदार हर पल व्यावसायिक पैतरा बदल रहे थे।धर्म भीरु भक्तों को उनके चंगुल से निकल पाना मुश्किल ही नहीं असंभव था।दूसरी तरफ टूरिस्ट गाइड लोगों को अलग-अलग जत्थों में बांटकर अयोध्या-महात्म्य समझा रहे थे।वे पूरी तरह धर्माचार्य की भूमिका में सक्रिय थे।लोग स्वीकारात्मक मुद्रा में लगातार सिर हिलाए जा रहे थे।पर्यटकों को लुभाने वाले मनमोहक शब्दों का गुलदस्ता इतना विश्वसनीय था कि गोया वे कोई टूरिस्ट गाइड नहीं बल्कि व्यासपीठ पर विराजमान आध्यात्मिक गुरु हों।अयोध्या की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक सभी मस्त।वर्तमान की चिंता भविष्य पर हावी नज़र आ रही है। धूमिलाना तेवर में कहें तो 'घोडा पीया जा रहा है , कुत्ता खाया जा रहा है।'अपने-अपने वर्तमान को स्वर्णिम बनाने की होड़ मची है।बिल्कुल ,जंगल-न्याय।संचित ज्ञान-विज्ञान के भारतीय स्रोत और उनसे जुड़ी भौगोलिक परिस्थितियां या तो इन टूरिस्ट गाइडों की मोहताज़ हैं या ऊँची टीआरपी की जुगाड़ में संलिप्त मीडिया की।बाबाओं की फलती-फूलती दुकान से जनमानस लगातार ठगा जा रहा है।दसकों पहले भारतीय ज्ञान-विज्ञान पर चलाया गया विदेशी हंटर आज भी हमें लहूलुहान कर रहा है।इनके प्रति भारतीयों में अविश्वास का बीज बो दिया गया है।इन्हें आउटडेटेड मानकर दरकिनार करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।दरकिनार की बात तो दूर,लोग खुलेआम अपना विरोध दर्ज़ करा रहे हैं।इनके मन और मस्तिष्क में यह भर दिया गया है कि संस्कृत पढ़कर इनकी संतान दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर नहीं चल पाएगी।अपनी अस्मिता से अंजान इन भोले-भालों को यह नहीं मालूम कि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक भारतीय वेदों की प्रमाणिकता पर अपनी मुहर लगा रहे हैं।आविष्कार-जगत में ये अधिक विश्वसनीय और तथ्यपूर्ण हैं।आवश्यकता है कि इस प्रकार की अद्यतन जानकारी को युवा पीढ़ी से परिचित कराया जाय।मेरा मानना है कि शिक्षा ही इसका सर्वोत्तम माध्यम है।हमारे प्राचीन ग्रन्थ मात्र भारत के ही नहीं बल्कि समष्टि की अनमोल धरोहर हैं।इन पर उच्च स्तरीय कमेटी का गठन व प्रामाणिक शोध कार्य की महती आवश्यकता है।दुनिया में भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति के लिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान के महत्त्वपूर्ण स्रोतों को शैक्षिक धारा से जोड़ना ही होगा।इस कार्य के लिए दुनिया के सभी थिंकर टैंकों को एकजुट होकर सामने आना पड़ेगा।

                       ओह ! मैं भी क्या-क्या सपने बुनने लगा ? प्रसाद की एक दुकान के सामने खड़ा होकर इतना बड़ा क्रन्तिकारी परिवर्तन ! समाज , संस्कृति और शिक्षा पर इतना गहरा मंथन ! न , बाबा न।ध्यान भंग हुआ।पुरुष अपनी खरीददारी कब का कर चुके थे।महिलाएं कॉस्मेटिक की दुकान पर अब भी व्यस्त थीं।सौंदर्य-सामग्री को चुनने में विलम्ब करती महिलाएं दल के मुखिया का पारा लगातार बढ़ा रही थीं।मैं भी कुछ अपने इस्ट -मित्रों के लिए लेता , लोग गाड़ी में बैठ चुके थे।कुछ भी न खरीद पाने का ग़म मुझे कम किन्तु मेरी सहधर्मिणी को अधिक था।पति के साथ शॉपिंग न कर पाने का मलाल चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।गाड़ी सरपट घर की तरफ दौड़ पड़ी।पुनः स्मरण हो आया - "उत्तर दिसि सरयू बह पावन।"

                             

-  डॉ.जितेन्द्र पाण्डेय

घुटन- रामधनी मल्ल


 घुटन

हमें जमीन चाहिए

सारा आसमान तुम रखलो

हमें संविधान चाहिए

गीता कुरान तुम रख लो

हमें रोटी चाहिए

आध्यात्मिक  ज्ञान तुम रखलो

हमें रोजगार  चाहिए

बत और ध्यान  तुम  रखलो

हमें कलम चाहिए

तीर कमान तुम रखलो

हमें सम्मान  चाहिए

ये कुरान भगवान तुम रखलो

 हमें  चाहिए गांधी मार्ग

कवि वेद प्रकाश प्रजापति वेद - जयचन्द प्रजापति 'जय' प्रयागराज


 

हिंदी साहित्य में एक ऐसे कवि है वेद प्रकाश प्रजापति वेद जो साहित्य में कई सम्मान पाए है।बहुत ही सुंदर रचना लिखते हैं। दोहा मुक्तक लघु कथा कई विधा में रचना करते हैं। इलाहाबाद के सराय इनायत के रिठैया गांव में एक साहित्यिक परिवार में जन्म  हुआ। कवि वेद जी वेदना के कवि हैं। इनकी रचना में सहजता है। संवेदना से भरी होती हैं।

पिता लालमणि प्रजापति ,जब वेद जी सातवीं में पढ़ते थे तभी गुजर गए। मां और चार छोटी बहनो के साथ परिवार की जिम्मेदारियो ने वेदजी के बचपन को जवान कर दिया पता ही नही चला। सातवीं के बाद से ही वेद की पढ़ाई समाप्त हो गई और तभी से वेदनाओं ने कविता का रूप ले लिया।

इन्ही वेदनाओं की ही देन है शायद की पिछले कई वर्षों से भयानक सरदर्द (माइग्रेन) से पीड़ित हैं। आज साहित्य के क्षेत्र में अनेको उपलब्धियां से जहाँ कवि को अति प्रसन्नता होती है रुचि बढ़ती है। वहीं पर मन मे असंतोष भी कवि को है। कविता जो मन के उद्द्गार के रूप में कभी कभी निकलती थी अब वही कविता जैसे कवि के जीवन का अंग बन गई है।

 कवि वेद प्रकाश प्रजापति'वेद' का जन्म वर्ष-1984 मे हुआ था। उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन विद्यालय में कार्यरत हैं। पिता लालमणि प्रजापति भी शिक्षक, साहित्यकार व समाजसेवी थे। माता श्रीमती अनारकली देवी जिसके साथ गांव में रह कर साहित्यिक कार्य में कवि वेद प्रजापति लगे हैं।

शिक्षा एम. ए. हिंदी साहित्यिक से हैं।

लेखन कार्य-2008 से विभिन्न विधाओं में गद्य एवं पद्य में रचना करते हैं। पत्रकारिता भी करते हैं,समाजसेवा भी करते हैं। साहित्यिक सम्पादक-पब्लिक पावर हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के हैं। आँचलिक भाषा एवं साहित्य प्रभारी उत्तरप्रदेश भी हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तक- भला वो आदमी ही क्या मुक्तक संग्रह है। इनका संपर्क मो0-9936636475 है।

कई प्राप्त सम्मान पत्र-राहुल सांकृत्यायन 'यात्रा वृत्तांत सम्मान, हरिशंकर परसाई 'व्यंग लेखन' सम्मान। गिरधर कविराय 'कुण्डलिया छन्द' सम्मान। करतुल एन हैदर 'रिपोर्ताज' सम्मान।'हिन्दी शैली महासम्मान'। पं0 विष्णु शर्मा 'बाल कहानी' सम्मान। मुंशी प्रेमचंद 'कहानीकार' सम्मान।स्वर कोकिला सरोजनी नायडू वार्षिक साहित्यिक सम्मान। रामचरण गुप्त 'लघुकथाकार' सम्मान -1। रामचरण गुप्त 'लघुकथाकार' सम्मान -2। आचार्य रामचंद्र शुक्ल 'हिंदी निबंध' सम्मान।

 महा देवी वर्मा हिंदी सम्मान आदरणीय रामचंद्र शुक्ल 'आलोचक' सम्मान। बाबू बाल मुकुन्द गुप्त 'हिन्दी साहित्य सेवा' सम्मान। दोहा 'आसु सृजन' सम्मान-5। काव्य रंगोली 'साहित्य भूषण' सम्मान-2017। दोहा शतकवीर' सम्मान 2018। अनुसंधान लघुकथा सम्मान' दिल्ली 2018।हिन्दी 'साहित्य श्री' सम्मान 2018। साहित्य संगम संस्थान 'श्रेष्ठ रचनाकार' सम्मान 2018। सा. सं. स. 'क्षेत्रीय बोली गौरव' सम्मान 2018।'हमारे कलमकार' मंच द्वारा 6 बार सम्मानित।

साहित्य संगम संस्थान द्वारा 'श्रेष्ठ सृजनकार' सम्मान2018। साहित्य संगम संस्थान 'क्षेत्रीय बोली संवर्धन' सम्मान 2018। साहित्यदीप संस्थान द्वारा 'श्रेष्ठ सृजनकार' सम्मान 2018।महफ़िल ए गजल साहित्य समागम द्वारा 3 बार 'श्रेष्ठ रचनाकर' सम्मान 2018। मनहरण 'घनाक्षरी शतकवीर' सम्मान 2018।मधुशाला साहित्य द्वारा 'साहित्य रत्न' 2018।  चौपाई शतकवीर' सम्मान 2019। सखी साहित्य परिवार द्वारा काव्यपाठ हेतु कुम्भ 2019 प्रयागराज महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद जी द्वारा काव्यपाठ हेतु सम्मानित।नई कलम..नया कलाम संस्था द्वारा 'श्रेष्ठ रचनाकार' सम्मान।राष्ट्रीय आँचलिक भाषा संस्थान द्वारा 'श्रेष्ठ रचनाकार' सम्मान। कलम की सुगन्ध छंदशाला द्वारा 'कलम सृजन सम्मान2019।-कलम की सुगंध द्वारा 'सुगन्ध भक्ति' सम्मान 2019।दीप जले साहित्य बढ़े 'हिंदी सेवा' सम्मान-2019। अर्णव कलश द्वारा कलम 'काव्यदीप सम्मान' 2019।अखिल भारतीय अखण्ड कवि सम्मेलन में काव्यपाठ हेतु सहभागिता सम्मान पत्र।-सहित्यगंगा संस्थान द्वारा गणतंत्र 'काव्य सारथी' सम्मान 2020।

 सहित्यदीप 'काव्य महाकुम्भ द्वितीय' द्वारा 'सहित्यदीप शलभ' सम्मान।प्रजापति विरादरी सभा प्रयागराज द्वारा 'गौरव सम्मान' दक्ष प्रजापति गर्व' सम्मान व 'स्मृति चिन्ह' राजस्थान।सहित्याञ्जली प्रभा प्रयागराज द्वारा 'साहित्यदीप' सम्मान,अतिरिक्त हिंदी श्री पब्लिकेशन द्वारा सम्मानित व अन्य अनेको संस्थाओं द्वारा सम्मानित हुए हैं।

देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्र- दैनिक जागरण, अमर उजाला, यूनाइटेड भारत, हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, सहारा टाइम्स, आदि में काव्यपाठ की खबरें छपी हैं। समय समय पे आयोजित अनेक कवि सम्मेलनों में प्रतिभाग करते हैं। देश के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा ऑनलाइन काव्य पाठ हेतु सम्मानित हुए हैं।

अब तक प्रकाशन---निर्मल हिंदुस्तान साप्ताहिकी में दो बार लघुकथाएं, भारत संवाद दैनिक समाचार पत्र में दो बार कविताएं,प्रजापति (कुम्हार)पत्रिका में कविता,साहित्यांजलि पत्रिका में मुक्तक,प्रतिलिपि पर चौपाई छन्द व 5 लघुकथाएं,मातृभाषा पर कविता

-वास्तविक न्यूज पे कविता

-दैनिक दस अंगुलिया पे सम्मान खबर

सखी साहित्य परिवार पत्रिका में मुक्तक, यूथ कार्नर पत्रिका में गजल प्रकाशित,'साहित्यदीप निहारिका' साझा काव्य संग्रह में दोहा, दैनिक दिशेरा टाइम्स में कोरोना सम्बन्धी रचना प्रकाशित,ये दोहे बोलते हैं साझा दोहा संग्रह कलम की सुगंध द्वारा इक्कीसवीं सदी के 21 कवि साझा संग्रह कलम की सुगंध द्वारा प्रकाशित हुई हैं।

 

 

         

।। परछाईं।।- भानु प्रकाश रघुवंशी


 

।। परछाईं।।

 

अगर आप अंधेरे को धकेलते हुए

सिर तक डूब चुके हैं प्रकाश में

तो छायांकित होगी तुम्हारी देह

बशर्ते पत्थर की तरह तोड़कर न करें

इसका विश्लेषण

आप जितने करीब होंगे प्रकाश पुंज के

कद उतना ही बड़ा होगा आपका ।

 प्रकाश स्रोत के ठीक विपरीत दिशा में

रस-भाव, सुन्दर- असुन्दर से परे

आप इसे तीनों काल की मिश्रित तस्वीर

योगिक या खगोलीय शब्दावली में

छाया कह सकते हैं।

 सजीव-निर्जीव में भेद किये बगैर

खड़ी होती है यह सबके साथ

जब अंधेरा रख दे कांधे पर हाथ

दोगला आदमी की तरह

छोड़ जाती है साथ

अपना कोई वजूद न होने पर भी

ताउम्र पीछा करती है हमारा ।

दीवार पर परछाईं को देखना

खुशी या विस्मय से भर देता है

इसकी अलग-अलग आक्रति

कोतूहल पैदा करतीं हैं

इनका इस्तेमाल बचपन को डरपोंक बनाने में भी

किया जाता है, जाने-अनजाने ।

 एक अदृश्य परछाईं से ढके होते हैं हम

मां कहती है मुझमें पूर्वजों की

परछाईं दीखती है

और बेटे-बेटियों में मेरी ।

यह हमें आदिमानव से मिलाती है

और हम बार-बार लौटते हैं

अपने अंधेरों में ,

एक दिन देह के साथ ही हो जाती है विलीन

जैसे जन्म हुआ था देह के साथ ।

नवगीत - विजय सिंह नाहटा



यह शिशिर की धूप

ढलने को हुई है

बात में ही ढह गया

लो !

भरभराकर

एक कच्ची भीत - सा दिन।

आस के सुनसान पथ पर

याद कोई झिलमिलाई

पर , यकायक---;

इक जरूरी मशविरे में

हो गया मशगूल --

जैसे गुफ्तगु -- सा दिन।

अर्चना का नवल स्वर है

प्रीत गोया अनछुई

कामनाओं की नदी में

बह गया --

लो ! शांत तट पर

आचमन - सा दिन।

राख में ढका हुआ

अंगार कोई पीर का

यूं  दिपदिपाया

शत सहस्रों दास्तां मन ने बुनी

मौन शाश्वत तोड़ता

आख्यान- सा दिन

              

 

शनिवार, 20 जनवरी 2024

स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता - डॉ0 रवीन्द्र कुमार*


                                 स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता

                          डॉ0 रवीन्द्र कुमार* 

सामान्यतः वर्ष 1857 ईसवीं की घटना को अँग्रेजी दासता से भारत की मुक्ति हेतु प्रथम प्रयास के रूप में लिया जाता है। इस घटना का इतिहासकारों, विषय-विशेषज्ञों और विद्वानों द्वारा अपने-अपने दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया गया है। यह घटना, वास्तव में, सम्पूर्ण भारत की ब्रिटिश उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष था, या नहीं? क्या इस संघर्ष का उद्देश्य देश के प्रत्येक जन की स्वतंत्रता था? क्या देश का आमजन इसमें भागीदारी कर रहा था? ये, और इनके साथ ही कई और प्रश्न वर्ष 1857 ईसवीं की घटना की प्रकृति और इसकी उपलब्धियों-अनुपलब्धियों के सम्बन्ध में इतिहासकारों, विषय-विशेषज्ञों और विद्वानों के विश्लेषण के विषय रहे हैं, और हमारे अध्ययन तथा पुनर्विश्लेषण के लिए उपलब्ध भी हैं।

हमारी वर्तमान पीढ़ी बहुत ही समझदार है। केवल संचार, चिकित्सा, अन्तरिक्ष सहित विज्ञान के अन्य सभी क्षेत्रों एवं तकनीकी आदि से सम्बद्ध पक्षों के अन्वेषणों में ही नहीं, अपितु समाज-विज्ञान और  मानविकी की परिधि में आने वाले सभी विषयों में भी विश्लेषण करने में पूर्ण सक्षम है। इसलिए, वर्ष 1857 ईसवीं के घटनाक्रम के पुनर्विश्लेषण के लिए भी युवाओं का स्वागत है। ईमानदारी से, निष्पक्ष रहकर और सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर वर्ष 1857 ईसवीं के घटनाक्रम के पुनर्विश्लेषण का मेरा युवा-वर्ग आह्वान है।

II

युवाओं का आह्वान करने के बाद अब मैं सबसे पहले जो बात दृढ़तापूर्वक कहूँगा, और जो मेरा अपना मत भी है, वह यह कि वर्ष 1857 ईसवीं के घटनाक्रम की परिधि देशव्यापी थी। उत्तर-दक्षिण व पूरब-पश्चिम, इस प्रकार देश के सभी भागों के लोग इसमें सम्मिलित थे। मंगल पाण्डेय, बहादुरशाह जफर, हजरत महल, ऊदा (उदा) देवी पासी, नानासाहेब, तांत्या टोपे, लक्ष्मीबाई, झलकारीबाई, कुँवर सिंह, फिरोजशाह, जयदयाल, हरदयाल आदि की इस घटनाक्रम में संलग्नता से लोग परिचित हैं। लेकिन, असम के कंदपरेश्वर सिंह और मणीराम दत्त बरुआ, ओडिशा के सुरेन्द्र शाही तथा उज्ज्वल शाही, कर्नाटक के भास्कर राव भावे सहित अनेक उन वीरों, जिन्हें उस घटना के बाद अँग्रेजों ने फाँसी दे दी थी, और साथ ही मद्रास में विद्रोह पर उतारू सिपाहियों की भी इस घटना में भूमिका से लोग नहीं के बराबर परिचित हैं। ऐसे लोगों की वर्ष 1857 ईसवीं के घटनाक्रम में भूमिका से भी हमारा परिचय होना चाहिए। यह परिचय विशेष रूप से उस घटनाक्रम के देशव्यापी होने की वास्तविकता पर मुहर लगाता है।

चूँकि वर्ष 1857 ईसवीं की अँग्रेजों के विरुद्ध उस घटना में देशभर से लोगों ने अपने धर्म-सम्प्रदाय एवं जाति-वर्ग आदि की सीमाओं को लांघते हुए भागीदारी की थी; उसमें महिलाएँ और पुरुष समान रूप से सम्मिलित थे, अतः वह संघर्ष राष्ट्रीय एकता को प्रदर्शित करता था। इसीलिए, वह अभूतपूर्व भी था। कार्ल मार्क्स जैसे विचारक ने भी उस घटना को पन्थ, क्षेत्र, समुदाय आदि की सीमाओं से परे एक देशव्यापी जनाक्रोश कहा था। साथ ही, संघर्ष को उन्होंने भारतीयों की एकता के एक बड़े प्रयास के रूप में स्वीकारा था। सावरकर ने तो इसे, जैसा कि हम जानते हैं, देश की स्वाधीनता का प्रथम संग्राम कहा था।

वह संघर्ष आगे भी राष्ट्रीय एकता की स्थापना के मार्ग में एक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। उसने उन्नीसवीं शताब्दी ईसवीं के उत्तरार्ध में समाज-सुधार आन्दोलन के अनेक प्रमुख नेतृत्वकारियों, जो विदेशियों से स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए देशवासियों की प्रेरणा के स्रोत भी रहे थे, और साथ ही देश की राजनीतिक गतिविधियों पर भी विशेष रूप से प्रभाव डाला।

लगभग नब्बे वर्षों की अवधि (1857-1947 ईसवीं) का देश का राजनीतिक घटनाक्रम ब्रिटिश साम्राज्यवाद से हिन्दुस्तान की स्वाधीनता और राष्ट्रीय एकता का इतिहास है। इसी काल में समाज और धर्म-सुधार आन्दोलन के अग्रणी, स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' की ओर से स्वदेशी और स्वराज्य का देशवासियों का आह्वान हुआ। स्वामी विवेकानन्द ने जनसेवा, विशेषकर दीन और वंचित लोगों की निस्स्वार्थ सेवा द्वारा देश की एकता और विकास की अपेक्षा की। मालवीयजी ने 'सत्यमेव जयते' का उद्घोष दोहराया। अरविन्द घोष, तिलक और अनेक सुधारकों, शिक्षाविदों और देश की स्वाधीनता के लिए नेतृत्व प्रदानकर्ताओं, चित्त रंजन दास, विपिन चन्द्र पाल, लाजपत राय, विट्ठलभाई पटेल, हकीम अजमल खान आदि ने निरन्तर कदम आगे बढ़ाए। 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है', इस आह्वान के साथ तिलक की नेतृत्वकारी भूमिका में 'स्वदेशी आन्दोलन' उसमें सम्मिलित है। विदेशी धरती पर देश की स्वाधीनता के लिए मैडम कामा के अथक प्रयास भी उसमें सम्मिलित हैं। वह घटनाक्रम भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास के सुनहरे पृष्ठों का अभिन्न भाग है।

III

विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी ईसवीं के द्वितीय दशक के उत्तरार्ध से लगभग पच्चीस वर्षों (1917-1942 ईसवीं) की अवधि में भारत का चरणबद्ध एवं सशक्त स्वाधीनता संग्राम, जिसके सर्वप्रमुख नेता महात्मा गाँधी थे, स्वराज-प्राप्ति के अभूतपूर्व और सफल प्रयास के साथ ही देश की एकता के निर्माण का ऐतिहासिक अध्याय भी है। गाँधीजी के नेतृत्व में देश के सभी भागों से भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष हेतु आगे आए आमजन ने 'वन्दे मातरम्' और 'भारतमाता की जय' जैसे उद्घोषों के साथ जिस प्रकार राष्ट्रीय एकता के निर्माण के लिए प्रतिबद्धता प्रकट की, वह अपने आप में अभूतपूर्व था। वह उन भारतीयों के लिए, जो राष्ट्रीय एकता बारे में सोचते हैं, आज भी प्रेरणादायक है, और उन लोगों के लिए भी प्रेरणादायक रहेगा, जो भविष्य में इसकी चिन्ता करेंगे

महात्मा गाँधी के अद्वितीय नेतृत्व में वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, अबुल कलाम आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, साथ ही सुभाष चन्द्र बोस , हसरत मोहनी, हकीम अजमल खान  और अनेक अन्य (सभी के नामों का उल्लेख सम्भव नहीं) देश की स्वाधीनता के लिए सतत संघर्ष के साथ ही राष्ट्रीय एकता के निर्माण के यज्ञ में भी अग्रणीय थे।

वल्लभभाई का नाम गाँधीजी के साथ सबसे पहले मैंने इसलिए रखा है कि गाँधी-मार्ग से उनके द्वारा संचालित और सफल बारडोली किसान सत्याग्रह (वर्ष 1928 ईसवीं) स्वाधीनता संग्राम में अद्वितीय योगदान देने के साथ ही जनैकता का भी बेजोड़ उदाहरण रहा था। उससे आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

IV

महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारत का स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्र की एकता के लिए प्रयास साथ-साथ चले, जो एक अभूतपूर्व एवं अति उल्लेखनीय घटना थी। स्वाधीनता, जो प्रत्येक की समानता के स्वाभाविक अधिकार से जुड़ा एक पक्ष है, और एकता, दोनों, भारत में गाँधीजी के सपनों के स्वराज्य की स्थापना के लिए, जो सजातीय समानता का द्योतक था और सनातन (शाश्वत) मूल्य जिसका आधार थे, आवश्यक थे। हिन्दुस्तान में उनके सपनों के स्वराज्य हेतु आज भी आवश्यक हैं।

महात्मा गाँधी सत्य के पूरक सनातन-मार्ग के अनुयायी थे। वे अविभाज्य समग्रता की वास्तविकता को स्वीकार करते थे। इसलिए, मानव-समानता की स्थापना, पुनरावृत्ति करूँगा कि स्वतंत्रता, न्याय और अधिकार समानता से अविभाज्य रूप से जुड़े पक्ष हैं, उनके जीवन का मिशन था। किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना सर्वकल्याण अंत्योदय से सर्वोदय, उनके उसी मिशन का प्रकटीकरण था। उनके अविभाज्य समग्रता-सम्बन्धी विचार के मूल में सर्व-एकता थी। इसी को अपने कार्यों में उन्होंने शिखर पर रखा और जीवनभर इसी के लिए वे संघर्षरत रहे।

भारतीय संस्कृति अपनी मूल भावना में सनातन-मार्ग मूल्यों से बंधी है। इसीलिए, यह संस्कृति अनेकता में एकता की स्थापना करती है। यह समन्वयकारी है; अपने मूल स्वरूप में ठहरते हुए यह समावेशी भी है। यह विकासोन्मुख है। महात्मा गाँधी ने सनातन-मार्ग और इससे बंधी भारतीय संस्कृति की आधारभूत विशिष्टताओं को स्वाधीनता संग्राम और, साथ ही, राष्ट्रीय एकता के अपने प्रयासों में दृढ़तापूर्वक साथ रखा और अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया। स्वराज्य और राष्ट्रीय एकता को एक-दूसरे का पूरक बनाते हुए एक अनुकरणीय मार्ग हमारे लिए छोड़ा। वही मार्ग स्वाधीनता संघर्ष और राष्ट्रीय एकता के लिए नब्बे वर्षों की अवधि में हुए प्रयासों में उन्हें शिखर पर स्थापित करता है। देश की स्वाधीनता को अक्षुण्ण रखने और राष्ट्रीय एकता की चिन्ता करने वालों के वह मार्ग महत्त्वपूर्ण है, प्रासंगिक हैं और मैं पुनः कहूँगा कि अनुकरणीय है।

*पद्मश्री और सरदार पटेल राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत इण्डोलॉजिस्ट डॉ0 रवीन्द्र कुमार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के पूर्व कुलपति हैं; वर्तमान में स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) के लोकपाल भी हैं।